मानवाधिकार वकीलों को सजा: एमनेस्टी इंटरनेशनल ने पाकिस्तान की न्याय प्रणाली को घेरा
एमनेस्टी इंटरनेशनल ने पाकिस्तान में मानवाधिकार वकीलों को 10 साल की सजा सुनाने पर न्याय प्रणाली की कड़ी आलोचना की है।

इस्लामाबाद (पाकिस्तान): एमनेस्टी इंटरनेशनल ने पाकिस्तान की न्याय प्रणाली की कड़ी आलोचना की है। यह प्रतिक्रिया इस्लामाबाद की एक आतंकवाद विरोधी अदालत (ATC) द्वारा मानवाधिकार वकीलों ईमान मज़ारी-हाज़िर और हादी अली चट्टा को दस साल की जेल की सजा सुनाने के बाद आई है।
एमनेस्टी इंटरनेशनल की क्षेत्रीय मानवाधिकार प्रभाव की वरिष्ठ निदेशक यास्मीन अहमद ने इस फैसले को पाकिस्तान की न्याय प्रणाली पर एक कलंक बताया है। उन्होंने आरोप लगाया कि आतंकवाद विरोधी कानूनों का इस्तेमाल मानवाधिकार रक्षकों को चुप कराने और असहमति को दबाने के लिए किया जा रहा है।
अहमद के मुताबिक, इस मामले की कानूनी कार्यवाही न्याय और निष्पक्ष सुनवाई के बुनियादी मानकों पर खरी नहीं उतरी। उन्होंने बताया कि शुरुआत में इन वकीलों को व्यक्तिगत रूप से सुनवाई में शामिल होने से रोका गया था। इसके बाद ट्रायल को जेल परिसर में स्थानांतरित कर दिया गया, जहां दोनों आरोपियों को पिंजरे जैसी संरचना के पीछे रखा गया था।
संस्था का आरोप है कि मज़ारी और चट्टा को उनके मानवाधिकार समर्थन, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण सभा के अधिकार के इस्तेमाल के कारण निशाना बनाया जा रहा है। एमनेस्टी ने पाकिस्तानी अधिकारियों से दोनों वकीलों को तुरंत रिहा करने और उन पर लगे सभी आरोप वापस लेने की मांग की है।
ये दोनों वकील जबरन गायब किए गए लोगों, राज्य द्वारा किए गए कथित अन्यायपूर्ण मुकदमों और पाकिस्तान के ईशनिंदा कानूनों से प्रभावित हाशिए के समुदायों और कार्यकर्ताओं का प्रतिनिधित्व करने के लिए जाने जाते हैं।
24 जनवरी 2026 को उन्हें इलेक्ट्रॉनिक अपराध रोकथाम अधिनियम (PECA) के तहत 10 से 17 साल की सजा सुनाई गई थी। यह कार्रवाई सेना की आलोचना करने और बलूच व पश्तून कार्यकर्ताओं के प्रति एकजुटता जताने वाली सोशल मीडिया पोस्ट के कारण की गई थी।
हालांकि, 17 सितंबर को पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट ने उनकी सजा स्थगित कर उन्हें जमानत दे दी थी, लेकिन उसी दिन उन्हें अलग आतंकवाद विरोधी आरोपों के तहत फिर से गिरफ्तार कर लिया गया।
इन मामलों का संबंध मार्च 2025 में बलूच कार्यकर्ताओं के विरोध प्रदर्शन के दौरान सरकार विरोधी नारे लगाने और सड़कें जाम करने के आरोपों से है। इसके अलावा, 2024 में एक क्रिकेट मैच के दौरान सुरक्षा बैरियर हटाने का एक अलग मामला भी उन पर दर्ज है।
यह फैसला पाकिस्तान में 26वें और 27वें संवैधानिक संशोधनों के बाद न्यायिक स्वतंत्रता को लेकर बढ़ती चिंताओं के बीच आया है।