पंजाब एंटी-टेरर कानून पर एमनेस्टी की चेतावनी, निष्पक्ष सुनवाई पर खतरा

इस्लामाबाद, पाकिस्तान: मानवाधिकार संगठन एमनेस्टी इंटरनेशनल ने पाकिस्तान की पंजाब सरकार के विवादित एंटी-टेरर (पंजाब संशोधन) कानून, 2026 पर गंभीर सवाल उठाए हैं। संगठन का कहना है कि यह कानून निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार को कमजोर करता है और अदालती कार्यवाही को गुप्त रखने का रास्ता खोलता है, जिससे पारदर्शिता और जवाबदेही दोनों पर असर पड़ेगा।
एमनेस्टी के मुताबिक, पंजाब असेंबली ने 31 अगस्त 2026 को यह संशोधन पारित किया। संगठन ने कहा कि इसमें जो गोपनीयता के प्रावधान रखे गए हैं, वे अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार कानून के तहत सार्वजनिक सुनवाई पर लगाई जाने वाली जायज़ पाबंदियों से कहीं आगे जाते हैं।
‘स्पेशल सिक्योरिटी केस’ क्या है और क्यों उठ रहे हैं सवाल
यह संशोधन पाकिस्तान के एंटी-टेरिज़्म एक्ट, 1997 में बदलाव करता है। इसके तहत “स्पेशल सिक्योरिटी केस” नाम की एक नई श्रेणी बनाई गई है। ऐसे मामलों की सुनवाई किसी अज्ञात और सुरक्षित जगह पर हो सकती है। जज, अभियोजक, बचाव पक्ष के वकील, पुलिस अधिकारी और गवाहों की पहचान छिपाई जा सकती है, और पूरे मुकदमे का रिकॉर्ड सील रखा जा सकता है।
एमनेस्टी ने चिंता जताई है कि किसी मामले को इस श्रेणी में डालने के लिए कोई साफ़ मापदंड तय नहीं किए गए हैं। इससे सरकारी एजेंसियों को व्यापक अधिकार मिल जाते हैं, और उन पर स्वतंत्र निगरानी का कोई पुख्ता इंतज़ाम नहीं दिखता। संगठन के अनुसार, आरोपी अपने मामले के इस वर्गीकरण को चुनौती भी नहीं दे पाएगा, जिससे अदालती कार्यवाही में कार्यपालिका के दखल का खतरा बढ़ता है।
एमनेस्टी ने यह भी कहा कि सील किया गया अदालती रिकॉर्ड अपील की प्रक्रिया को रोक सकता है। जब आरोपी को ज़रूरी दस्तावेज़ ही नहीं मिलेंगे, तो वह प्रक्रियागत गड़बड़ियों को साबित कैसे करेगा? संशोधन में ये गोपनीयता नियम अपीलीय सुनवाई तक भी बढ़ा दिए गए हैं, और सरकार को “उचित समझे” तो और उपाय जोड़ने की छूट भी मिली है।
इस कानून को विपक्षी सांसदों और नागरिक समाज के समूहों की आपत्तियों के बावजूद पारित किया गया। विरोध में विपक्षी सदस्य सदन से बाहर चले गए। इसके खिलाफ लाहौर हाई कोर्ट में कई याचिकाएं दायर हुई हैं।
एमनेस्टी ने याद दिलाया कि पाकिस्तान का मौजूदा आतंकवाद-रोधी ढांचा पहले भी संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार संस्थाओं की आलोचना झेल च