संयुक्त राष्ट्र प्रमुख का बड़ा बयान, नेपाल की त्रासदी को बताया जलवायु परिवर्तन का गंभीर परिणाम.

संयुक्त राष्ट्रसंघ के महासचिव António Guterres ने हाल ही में दुनिया के सामने एक बहुत बड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा है कि तीन साल पहले उन्होंने नेपाल के माउंट एवरेस्ट इलाके से जलवायु परिवर्तन को लेकर जो चेतावनी दी थी, आज नेपाल की मौजूदा और डरावनी घटनाएं उसी का बिल्कुल सटीक और वास्तविक रूप हैं। यह बात उन्होंने संयुक्त राष्ट्रसंघ की 81वीं महासभा को मंगलवार की सुबह संबोधित करते हुए कही है। महासचिव ने साफ शब्दों में बताया कि दुनिया की छत कही जाने वाली जगह अब खतरे के घेरे में है।
जलवायु परिवर्तन अब कोई काल्पनिक बात नहीं बल्कि खुली सच्चाई है
अपने संबोधन में António Guterres ने पुराने समय को याद करते हुए कहा कि जब उन्होंने तीन साल पहले नेपाल के हिमालय की यात्रा की थी और बर्फ के बहुत तेजी से पिघलने पर खतरे की घंटी बजाई थी, तब कई लोगों ने उनकी बात को नजरअंदाज कर दिया था। कुछ लोगों ने तो यह भी कह दिया था कि इस खतरे को बहुत बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जा रहा है। लेकिन अब नेपाल में जो दुखद घटनाएं सामने आ रही हैं, उन्होंने साबित कर दिया है कि जलवायु परिवर्तन के बुरे प्रभाव हमारी उम्मीद से कहीं ज्यादा जल्दी और बहुत बड़े दायरे में फैल रहे हैं।
कमजोर देशों को चुकानी पड़ रही है सबसे बड़ी कीमत
यूएन प्रमुख ने इस बात पर बहुत जोर दिया कि जलवायु बदलाव का सबसे ज्यादा नुकसान उन देशों को उठाना पड़ रहा है जो पहले से ही कमजोर हैं। इन देशों की गलती न के बराबर है, फिर भी इन्हें सबसे गंभीर परिणामों का सामना करना पड़ रहा है। उन्होंने साफ कहा कि प्रदूषण फैलाने वाले बड़े और समृद्ध देशों को इसकी पूरी कीमत चुकानी होगी। जब तक इन प्रभावित और कमजोर देशों को न्याय नहीं मिलेगा, तब तक इस समस्या का सही समाधान निकल पाना बहुत मुश्किल होगा।
धनराशि की कमी पर जताई गहरी चिंता
जलवायु परिवर्तन के असर से निपटने के लिए जो वित्तीय मदद या फंड मिलना चाहिए, वह बहुत ही कम है। António Guterres ने 'हानि एवं क्षति कोष' में जमा राशि को शर्मनाक रूप से बहुत कम बताया है। उन्होंने कहा कि इस फंड में पर्याप्त मात्रा में पैसा होना चाहिए ताकि पीड़ित देशों की समय पर मदद की जा सके। अब दुनिया में किसी भी तरह का शोषण और लूट नहीं चलना चाहिए। उन्होंने विकसित देशों से अपील की है कि वे अपनी पुरानी प्रतिबद्धताओं को पूरा करें और जलवायु वित्त को तीन गुना बढ़ाएं, ताकि कमजोर देशों को इस आपदा से लड़ने में पूरी ताकत मिल सके।