ब्लैकरॉक रिपोर्ट: एशिया में ईंधन की लागत युद्ध से पहले के मुकाबले दोगुनी से ज्यादा
ब्लैक रॉक की रिपोर्ट के मुताबिक मिडिल ईस्ट में ऊर्जा संकट के कारण एशिया में ईंधन की लागत युद्ध पूर्व स्तर से दोगुनी से अधिक हो गई है।

नई दिल्ली: मिडिल ईस्ट में जारी ऊर्जा संकट के कारण एशिया में ईंधन की लागत युद्ध से पहले के स्तर के मुकाबले दोगुनी से भी अधिक हो गई है। ब्लैक रॉक की एक रिपोर्ट के मुताबिक, ऊर्जा आपूर्ति में आने वाली बाधाएं अब कच्चे तेल से हटकर रिफाइनिंग और शिपिंग की समस्याओं की ओर बढ़ गई हैं।
रिपोर्ट में बताया गया है कि शुरुआती दौर में रणनीतिक भंडार, इन्वेंट्री और शिपमेंट के रास्तों में बदलाव जैसे बफर ने कच्चे तेल की आपूर्ति में आई कमी को संभालने में मदद की थी। हालांकि, खाड़ी क्षेत्र में शिपिंग रूट और ऊर्जा बुनियादी ढांचे पर हुए नए हमलों ने इन बफर सिस्टम की परीक्षा ली है, जिससे डाउनस्ट्रीम ईंधन बाजारों पर दबाव बढ़ गया है।
ब्लैक रॉक ने कहा कि अब कमी डाउनस्ट्रीम क्षेत्र में स्थानांतरित हो गई है। रिफाइनिंग और शिपिंग में आई बाधाओं की वजह से ईंधन की कीमतें बढ़ गई हैं, जबकि कच्चे तेल की आपूर्ति में सुधार हुआ है। 23 अक्टूबर को ब्रेंट क्रूड ऑयल करीब 117 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया था, जो अप्रैल के बाद का उच्चतम स्तर था, हालांकि बाद में यह गिरकर 110.18 डॉलर प्रति बैरल पर आ गया।
इस संकट का असर अलग-अलग क्षेत्रों पर अलग-अलग रहा है। इस साल रिफाइनर्स के शेयरों में करीब 160 फीसदी और टैंकर ऑपरेटरों के शेयरों में 120 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है, जबकि प्रमुख तेल और गैस उत्पादकों के शेयरों में 40 फीसदी की वृद्धि देखी गई है।
रिपोर्ट के अनुसार, यूरोप इस झटके के प्रति सबसे अधिक संवेदनशील रहा है। अनुमान है कि इस ऊर्जा संकट ने यूरोप की जीडीपी को करीब 0.5 प्रतिशत कम कर दिया है, जबकि अमेरिका में यह गिरावट 0.1 प्रतिशत रही। यूरोप में प्राकृतिक गैस का भंडारण लगभग 75 प्रतिशत है, जो 2011 में रिकॉर्ड रखने की शुरुआत के बाद से सबसे निचला मौसमी स्तर है।
यूरोपीय ऊर्जा कीमतों में इस साल 170 फीसदी की वृद्धि हो चुकी है। एलएनजी आपूर्ति में बाधाओं के बीच अगर सर्दी अधिक रही, तो कीमतें और बढ़ सकती हैं। वहीं, अमेरिका एक शुद्ध ऊर्जा निर्यातक होने के कारण सुरक्षित रहा और एशिया को उसके मजबूत टेक्नोलॉजी निर्यात ने ऊर्जा आयात की बढ़ती लागत से बचाने में मदद की।
ब्लैक रॉक का मानना है कि ऊर्जा सुरक्षा और बुनियादी ढांचे में निवेश की यह प्रवृत्ति संघर्ष खत्म होने के बाद भी जारी रहेगी। इसे एक संरचनात्मक बदलाव के रूप में देखा जा रहा है, जिससे वैकल्पिक आपूर्ति मार्ग बनाने और ऊर्जा लचीलापन मजबूत करने के लिए पूंजी की प्रतिस्पर्धा बढ़ सकती है और सरकारी बॉन्ड यील्ड पर दबाव पड़ सकता है।