मिडिल ईस्ट संघर्ष के बीच एशियाई देशों ने बढ़ाई ऊर्जा सुरक्षा, भारत और यूएई मिलकर कर रहे हैं बड़ा काम

Nura Basta3 September 20263 min read19 viewsUAE
मिडिल ईस्ट संघर्ष के बीच एशियाई देशों ने बढ़ाई ऊर्जा सुरक्षा, भारत और यूएई मिलकर कर रहे हैं बड़ा काम

मिडिल ईस्ट में चल रहे तनाव और संघर्ष के बीच एशियाई देशों ने अपनी ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने के लिए बड़ा कदम उठाया है। अमेरिका, इजराइल और ईरान के बीच छह महीने पहले शुरू हुए युद्ध की वजह से तेल और गैस की सप्लाई पर बहुत बुरा असर पड़ा है। इस सप्लाई चेन में सबसे बड़ी बाधा होर्मुज जलडमरूमध्य यानी Strait of Hormuz के पास आई है, जिससे एशियाई अर्थव्यवस्थाओं की मुश्किलें काफी बढ़ गई हैं। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए अब सभी देश अपनी रणनीतिक तेल और गैस स्टोरेज क्षमता को तेजी से बढ़ाने में जुट गए हैं ताकि भविष्य में किसी भी संकट से आसानी से निपटा जा सके।

भारत और यूएई की नई ऊर्जा साझीदारी

आगामी जोखिमों से निपटने के लिए भारत सरकार और यहां की सरकारी कंपनियां लगातार नए कदम उठा रही हैं। जुलाई 2026 में सरकारी कंपनी ऑयल एंड नेचुरल गैस कॉरपोरेशन यानी ONGC ने एक नया 1.75-million-metric-tonne यानी करीब 13 million barrels का रिजर्व बनाने का ऐलान किया। इसके अलावा देश में पहले से ही stockpiles को 6.5 million metric tonnes तक बढ़ाने की योजना पर काम चल रहा है। यूएई की जानी-मानी कंपनी अबू धाबी नेशनल ऑयल कंपनी यानी ADNOC भारत में अपने कच्चे तेल की स्टोरेज क्षमता को बढ़ाकर 30 million barrels करने की योजना बना रही है। साथ ही नई दिल्ली इस बात पर भी विचार कर रही है कि क्या भारत अपनी रणनीतिक स्टोरेज के लिए यूएई के Port of Fujairah का इस्तेमाल कर सकता है या नहीं।

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चीन और दक्षिण कोरिया की नई रणनीतियां

सिर्फ भारत ही नहीं बल्कि अन्य एशियाई देश भी इस दिशा में बहुत तेजी से काम कर रहे हैं। दक्षिण कोरिया अपने मौजूदा 146-million-barrel रिजर्व में 30 से 40 million barrels की बढ़ोतरी करने पर विचार कर रहा है, जो उनके पहले के 20-million-barrel के लक्ष्य से काफी ज्यादा है। चीन ने अपने 2026-2030 के पांच साल के विकास योजना में नई पाइपलाइनों और लिक्विफाइड नेचुरल गैस यानी LNG स्टोरेज को शामिल कर लिया है। द लैंटॉ ग्रुप के एक्सपर्ट David Fishman के मुताबिक यह कदम सीधे तौर पर होर्मुज जलडमरूमध्य की नाकाबंदी के जवाब में उठाया गया है। इसके अलावा थाईलैंड भी क्रॉस-पेनिंसुला क्रूड पाइपलाइनों और टैंक फार्म्स की योजना पर काम कर रहा है ताकि वह खुद को एक क्षेत्रीय स्टोरेज हब के रूप में स्थापित कर सके।

अंतर्राष्ट्रीय सहयोग और द्विपक्षीय समझौते

इस पूरे संकट के दौरान देशों के बीच आपसी सहयोग और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी कई बड़े फैसले लिए गए हैं। अप्रैल 2026 में जापान की प्रधानमंत्री Sanae Takaichi ने दक्षिण पूर्व एशियाई देशों को पेट्रोलियम और स्टोरेज विकसित करने में मदद करने के लिए 10 billion dollars के POWERR Asiainitiative की शुरुआत की। इसके तुरंत बाद जुलाई 2026 में प्रधानमंत्री ताइची और भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक ऊर्जा resilience partnership को औपचारिक रूप दिया। इसके अलावा 19 मई 2026 को जापान और दक्षिण कोरिया के नेताओं ने भी रणनीतिक stockpiles को लेकर आपसी सहयोग बढ़ाने का वादा किया।

एशियाई विकास बैंक यानी ADB के अध्यक्ष Masato Kanda ने 1 सितंबर 2026 को पलाव के राष्ट्रपति Surangel S. Whipps, Jr. से मुलाकात की। इस बैठक में आयातित ईंधन की लागत से होने वाले नुकसान को कम करने और ऊर्जा विविधता पर चर्चा की गई। ऑक्सफोर्ड इंस्टीट्यूट फॉर एनर्जी स्टडीज की फेलो Parul Bakshi का कहना है कि मौजूदा निवेश मुख्य रूप से उन बुनियादी ढांचों पर केंद्रित है जो भू-राजनीतिक जोखिमों से बचाते हैं। काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस की सीनियर फेलो Clara Gillispie ने भी बताया कि जापान, दक्षिण कोरिया और सिंगापुर इस संकट के समय सप्लाई चेन को स्थिर रखने के लिए मिडिल ईस्ट के सप्लायर्स के साथ अपने स्टोरेज रिश्तों को और मजबूत कर रहे हैं।

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