UNHRC में उठा बलूच महिलाओं के अधिकारों का मुद्दा

जिनेवा में आयोजित संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (UNHRC) के 63वें सत्र के दौरान बलूच महिलाओं, लड़कियों और मानवाधिकार रक्षकों पर हो रहे अत्याचारों का गंभीर मामला उठाया गया है। वक्ताओं ने क्षेत्र में हो रहे कथित मानवाधिकार उल्लंघनों की स्वतंत्र जांच कराने और शांतिपूर्ण तरीके से न्याय की मांग करने वालों को सुरक्षा प्रदान करने की जोरदार अपील की है।
जिनेवा में गूंजी बलूच महिलाओं की आवाज
सत्र के दौरान एजेंडा आइटम 8 पर बोलते हुए अल बराएम एसोसिएशन फॉर चैरिटेबल वर्क की महरा अब्दुल जलिल ने चिंता व्यक्त की। उन्होंने आरोप लगाया कि बलूच महिलाओं और बच्चियों को जबरन गायब किए जाने, मनमाने ढंग से हिरासत में लेने, यातना, न्यायेतर हत्याओं और शांतिपूर्ण राजनीतिक अभिव्यक्ति पर रोक जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है।
उन्होंने बताया कि न्याय और जवाबदेही की मांग करने वाले शांतिपूर्ण आंदोलनों में बलूच महिलाओं की भूमिका महत्वपूर्ण रही है। हालांकि, जिन परिवारों के सदस्य कथित तौर पर गायब या मारे गए हैं, उन्हें गंभीर भावनात्मक, सामाजिक और आर्थिक कठिनाइयों से गुजरना पड़ रहा है। परिषद से बलूच महिलाओं के अधिकारों की रक्षा और स्वतंत्र निगरानी सुनिश्चित करने का आग्रह किया गया है।
मानवाधिकार रक्षकों और कार्यकर्ताओं की स्थिति
एक अन्य सत्र में जुस्सोर यूथ ऑर्गनाइजेशन की डायना स्टेफनी देहिमत ने भी बलूच मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की स्थिति पर गंभीर चिंता जताई। उन्होंने जबरन गायब किए जाने और मनमाने ढंग से हिरासत में लेने के मामलों का हवाला देते हुए कहा कि इससे महिलाएं और नाबालिग भी प्रभावित हुए हैं।
वक्ताओं ने महाजबीन बलूच और डॉ. साहिबा बलूच जैसे मामलों का विशेष रूप से उल्लेख किया, जिन्हें मानवाधिकार कार्यों के कारण दबाव और कानूनी कार्रवाई का सामना करना पड़ा है। संयुक्त राष्ट्र से इन मामलों की जांच करने, लापता व्यक्तियों का पता लगाने और प्रभावित परिवारों को न्याय दिलाने की मांग की गई है।