बलूचिस्तान में जबरन बेदखली और घरों की तोड़फोड़ से लोगों के बुनियादी अधिकारों का हनन हो रहा है सम्मी दीन बलूच ने लगाया आरोप

Gautam Sahu17 October 20262 min read0 viewsWorld
बलूचिस्तान में जबरन बेदखली और घरों की तोड़फोड़ से लोगों के बुनियादी अधिकारों का हनन हो रहा है सम्मी दीन बलूच ने लगाया आरोप

बलूचिस्तान (पाकिस्तान): बलूच एक्टिविस्ट सम्मी दीन बलूच ने आरोप लगाया है कि बलूचिस्तान के अलग-अलग इलाकों में लोगों को जबरन बेदखल किया जा रहा है और उनके घरों को तोड़ा जा रहा है। उन्होंने कहा कि जरूरी सामान की सप्लाई पर लंबे समय तक पाबंदी लगाकर समुदायों के बुनियादी अधिकारों का उल्लंघन किया जा रहा है।

द बलूचिस्तान पोस्ट के मुताबिक, जबरन गायब किए गए डॉ. दीन मोहम्मद बलूच की बेटी सम्मी ने बताया कि दशकों से हो रहे विस्थापन ने हजारों परिवारों को उजाड़ दिया है। इसकी वजह से लोग अपनी पुश्तैनी जमीन, घरों और कमाई के पारंपरिक साधनों से दूर हो गए हैं।

साल 2026 में दर्ज की गई ऐसी घटनाएं मस्तुंग से लेकर ग्वादर तक फैली हुई हैं। इनमें शूर पारोड, नुशकी, चगाई और खारान जैसे इलाके शामिल हैं। सम्मी के मुताबिक कुछ निवासियों को घर खाली करने का आदेश दिया गया, जबकि कई बस्तियों को पूरी तरह ढहा दिया गया, जिससे परिवारों को दूसरी जगह जाने का समय तक नहीं मिला।

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जेहरी, मशकाय और ज़मुरान में लंबे समय तक कर्फ्यू और सड़कों की बंदी रही। इसकी वजह से महीनों तक लोगों की पहुंच भोजन और अन्य जरूरी चीजों तक नहीं रही, जिससे उनकी मुश्किलें और बढ़ गईं।

सम्मी ने दूरदराज के इलाकों के गरीब परिवारों की खराब स्थिति पर जोर दिया। ये परिवार खाने, शिक्षा और स्वास्थ्य के लिए छोटी खेती और पशुपालन पर निर्भर रहते हैं। अचानक हुए विस्थापन से उनकी आर्थिक नींव खत्म हो जाती है और उन्हें नए स्थानों पर रहने, काम और बच्चों की पढ़ाई के लिए संघर्ष करना पड़ता है।

उन्होंने कहा कि सुरक्षा कारणों का हवाला देकर अधिकारी विस्थापित आबादी के प्रति अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकते। उनके मुताबिक किसी भी तरह के पुनर्वास के साथ पर्याप्त सुरक्षा, वैकल्पिक आवास, रोजगार के अवसर और जरूरी सेवाओं की उपलब्धता होनी चाहिए, साथ ही सुरक्षित वापसी की गारंटी भी मिलनी चाहिए।

सम्मी ने तर्क दिया कि पुश्तैनी इलाकों से समुदायों को हटाना और उनकी वापसी के बारे में स्पष्टता न होना केवल मानवीय संकट नहीं है। इससे उनकी पहचान, संस्कृति, सामुदायिक संबंधों और अपने भविष्य पर नियंत्रण रखने की क्षमता खत्म होती है।

अपने अनुभवों के आधार पर उन्होंने बताया कि पारंपरिक परिवेश से उजड़े परिवार अक्सर अलगाव और अनिश्चितता का सामना करते हैं। जब उन्हें बिना किसी रिश्तेदार या सामुदायिक समर्थन के अनजान शहरों में बसने के लिए मजबूर किया जाता है, तो उनकी स्थिति और बिगड़ जाती है।

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