बांग्लादेश में 11 दिन के भीतर डॉक्टर बेटे और पिता की संदिग्ध मौत, हिंदू समुदाय में खौफ

बांग्लादेश में एक बार फिर अल्पसंख्यक हिंदू समुदाय से जुड़ी बेहद डराने वाली घटना सामने आई है जहाँ महज 11 दिन के अंतराल में एक युवा डॉक्टर और उसके पिता की असामान्य तरीके से मौत हो गई है। इस घटना के बाद से पूरे इलाके में दहशत का माहौल है और स्थानीय लोगों के साथ-साथ अल्पसंख्यक समुदाय के मन में सुरक्षा को लेकर बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। पुलिस इस पूरे मामले की गंभीरता से जांच कर रही है लेकिन मौतों के पीछे की असली वजह अभी तक पूरी तरह साफ नहीं हो पाई है।
सिलहट और मौलवीबाजार में हुईं घटनाएं
मिली जानकारी के मुताबिक, सबसे पहले घटना 7 सितंबर को सिलहट शहर के मिर्जाजंगल इलाके में सामने आई। यहाँ किराए के मकान से 31 साल के युवा चिकित्सक पद्मजीत चक्रवर्ती प्रांत का फंदे से लटका हुआ शव बरामद किया गया था। वह ब्राह्मणबाड़िया मेडिकल कॉलेज में डॉक्टर के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे थे। बताया जा रहा है कि उनकी शादी को अभी महज दो साल ही हुए थे और नए मकान में रहने जाने के ठीक अगले ही दिन उनकी यह संदिग्ध मौत हो गई। स्थानीय पुलिस ने शुरुआती जांच के आधार पर इसे आत्महत्या की आशंका बताया है।
इस गम से परिवार अभी उबर भी नहीं पाया था कि ठीक 11 दिन बाद उनके पिता पूर्णेंदु चक्रवर्ती का शव भी संदिग्ध हालात में मिला। उनका शव मौलवीबाजार शहर के एम. सैफुर रहमान रोड पर स्थित उनके अपने पारिवारिक व्यावसायिक प्रतिष्ठान 'भटेर फार्मेसी' की दूसरी मंजिल के एक कमरे से बरामद हुआ। मौलवीबाजार मॉडल थाने के उपनिरीक्षक मनोज कुमार सरकार ने इस बात की पुष्टि की है कि मौत के सटीक कारणों का अभी तक पता नहीं चल पाया है। पुलिस ने पोस्टमार्टम करवाने के बाद शव परिजनों को सौंप दिया है और गहराई से मामले की छानबीन की जा रही है।
अल्पसंख्यक नेताओं ने जताई गहरी चिंता
पिता और पुत्र की इस तरह अचानक हुई मौतों ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। बांग्लादेश राष्ट्रीय हिंदू महासंघ के महासचिव पलाश कांति दे ने इस पर गहरी चिंता व्यक्त की है। उन्होंने दोनों ही घटनाओं की निष्पक्ष और पारदर्शी न्यायिक जांच की मांग उठाई है। उनका कहना है कि इस मामले में आत्महत्या और हत्या दोनों ही पहलुओं की गंभीरता से जांच होनी चाहिए ताकि सच्चाई सबके सामने आ सके। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि देश में अल्पसंख्यक समुदाय से ताल्लुक रखने वाले डॉक्टर, शिक्षक, पुलिसकर्मी और पत्रकार भी खुद को सुरक्षित महसूस नहीं कर पा रहे हैं और लगातार डर के साये में जी रहे हैं।
पलाश कांति दे ने ढाका विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्र विभाग के प्रोफेसर अबुल बरकत की पुस्तक 'राजनीतिक अर्थव्यवस्था' में दिए गए पुराने आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि अल्पसंख्यकों पर अत्याचार और धमकियों का सिलसिला पुराना है। उन्होंने आरोप लगाया कि यदि हालात ऐसे ही बने रहे तो देश में अल्पसंख्यक आबादी का अस्तित्व खतरे में पड़ सकता है। उनके अनुसार डर और असुरक्षा के माहौल की वजह से कई पीड़ित परिवार अपनी बात खुलकर सामने नहीं रख पाते हैं और न ही मीडिया तक अपनी शिकायत पहुंचा पाते हैं।
सामने नहीं आ पाती कई घटनाएं
हिंदू महासंघ के महासचिव ने यह भी दावा किया कि हिंदू समुदाय के खिलाफ होने वाले जुल्मों का एक बहुत छोटा हिस्सा ही मीडिया और दुनिया के सामने आ पाता है। डर के कारण लोग सोशल मीडिया पर भी कुछ लिखने से बचते हैं। उन्होंने इन हालात की तुलना 1971 के मुक्ति संग्राम के समय हुए अत्याचारों से की है और अंतरराष्ट्रीय समुदाय की चुप्पी पर भी सवाल उठाए हैं। हालांकि प्रशासनिक स्तर पर अभी तक दोनों मौतों के बीच किसी भी आपसी संबंध की पुष्टि नहीं हुई है और पुलिस की जांच रिपोर्ट आने के बाद ہی स्थिति पूरी तरह स्पष्ट होगी।