भूटान ने पीएम मोदी को समर्पित किया 76वां स्तूप, राजा और रिजिजू ने हटाया पट्टिका से परदा
भूटान ने गेलेफू माइंडफुलनेस सिटी में 108 बौद्ध स्तूप बनाए, जिनमें से 76वां स्तूप पीएम मोदी को समर्पित किया गया है।

नई दिल्ली: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भूटान के राजा और वहां की जनता के प्रति आभार व्यक्त किया है। भूटान ने उन्हें 76वां बौद्ध स्तूप, जिसे 'जांगचूब चोर्टन' के नाम से जाना जाता है, समर्पित किया है। पीएम मोदी ने इस कदम को दोनों देशों के बीच साझा आध्यात्मिक और सभ्यतागत विरासत और विशेष मित्रता का एक स्थायी प्रतीक बताया है।
फेसबुक पर एक पोस्ट के जरिए प्रधानमंत्री ने कहा कि वह इस स्नेह और उदारता से बेहद प्रभावित हैं। उन्होंने भारत की जनता की ओर से इस सम्मान को स्वीकार किया। पीएम मोदी के मुताबिक, जांगचूब चोर्टन दोनों देशों के लोगों के बीच मित्रता के विशेष बंधनों और साझा विरासत के प्रतीक के रूप में रहेगा।
विदेश मंत्रालय (MEA) ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर जानकारी दी कि भूटान ने 1 नवंबर 2026 को गेलेफू माइंडफुलनेस सिटी में आयोजित समारोह के दौरान मात्र छह घंटे में 108 बौद्ध स्तूप बनाकर एक ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की है।
मंत्रालय ने बताया कि भूटान के राजा और केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने उस पट्टिका का अनावरण किया, जिसके जरिए 76वें स्तूप को पीएम मोदी को समर्पित किया गया। यह कदम भारत और भूटान के बीच गहरे आध्यात्मिक और सभ्यतागत संबंधों को दर्शाता है।
केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने सोमवार को ल्हाबब डुचेन बौद्ध उत्सव के अवसर पर गेलेफू माइंडफुलनेस सिटी में इन 108 स्तूपों के निर्माण और प्रतिष्ठा के पवित्र समारोह में शिरकत की। इस कार्यक्रम में भूटान के राजा, रानी ग्यालत्सुएन, प्रधानमंत्री दाशो त्शेरिंग तोबगे और बड़ी संख्या में स्थानीय लोग मौजूद थे। रिजिजू ने बताया कि समारोह के दौरान पारंपरिक 'डुंगचेन' बजाए गए।
रिजिजू ने कहा कि एक स्तूप को भारतीय प्रधानमंत्री को समर्पित करना मोदी के विजन और भारत-भूटान मित्रता को मजबूत करने की उनकी प्रतिबद्धता को दर्शाता है। उन्होंने यह भी बताया कि गेलेफू में राजा के साथ उनकी मुलाकात हुई, जहां उन्होंने पीएम मोदी की शुभकामनाएं पहुंचाईं और द्विपक्षीय साझेदारी के प्रति भारत की प्रतिबद्धता दोहराई।
रिजिजू के अनुसार, इन 108 बौद्ध स्तूपों का निर्माण 1 नवंबर को आधी रात के बाद शुरू हुआ था। इस कार्य में 40,000 से अधिक स्वयंसेवकों, भिक्षुओं और शिल्पकारों ने हिस्सा लिया और इसे महज छह घंटों में पूरा किया।