नेपाल की पूर्व राष्ट्रपति बिद्या भण्डारी की राजनीति में वापसी, CPN-UML में बनीं वरिष्ठ नेता

Gautam Sahu8 October 20262 min read0 viewsWorld
नेपाल की पूर्व राष्ट्रपति बिद्या भण्डारी की राजनीति में वापसी, CPN-UML में बनीं वरिष्ठ नेता

नेपाल की पहली महिला राष्ट्रपति रहीं बिद्या देवी भण्डारी एक बार फिर सक्रिय राजनीति के मैदान में उतर आई हैं। राष्ट्रपति पद का अपना दूसरा कार्यकाल पूरा करने के करीब तीन साल बाद, उन्होंने नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल-यूनिफाइड मार्क्सिस्ट-लेनिनिस्ट (CPN-UML) में वरिष्ठ नेता के रूप में अपनी जगह बनाई है। गुरुवार को ललितपुर स्थित पार्टी कार्यालय में शपथ लेने के बाद उन्होंने पार्टी की स्टैंडिंग कमेटी की बैठक में भी हिस्सा लिया।

बता दें कि बिद्या भण्डारी अक्टूबर 2015 में देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद पर बैठने के बाद सक्रिय पार्टी राजनीति से दूर हो गई थीं। उस समय वह CPN-UML की उपाध्यक्ष थीं। उन्होंने 9 मार्च 2023 तक लगातार दो कार्यकाल तक राष्ट्रपति के रूप में अपनी सेवाएँ दीं। राष्ट्रपति पद से हटने के बाद जब उन्होंने पार्टी में वापस लौटने की कोशिश की, तो शुरुआत में पार्टी ने उनकी सदस्यता रद्द कर दी थी। उस समय पार्टी का मानना था कि देश के राष्ट्रपति रह चुके व्यक्ति का सक्रिय राजनीति में लौटना उचित नहीं है।

पार्टी के नियमों में बदलाव और नई भूमिका

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पिछले साल UML की केंद्रीय समिति ने स्पष्ट किया था कि पूर्व राष्ट्रपतियों को राजनीतिक दलों का सदस्य नहीं होना चाहिए। पार्टी के आंतरिक निर्देश में उन्हें 'राष्ट्र का गौरव' और 'देश का रत्न' बताते हुए कहा गया था कि उन्हें गरिमा के साथ रहना चाहिए, न कि एक कार्यकर्ता के रूप में। हालांकि, करीब 14 महीने बाद पार्टी ने अपना यह फैसला पलट दिया। सितंबर में हुई केंद्रीय समिति की बैठक में बिद्या भण्डारी को वरिष्ठ नेता नियुक्त करने का निर्णय लिया गया, जिसे पार्टी अध्यक्ष केपी शर्मा ओली ने औपचारिक रूप से लागू किया।

अब पार्टी के भीतर बिद्या भण्डारी का कद काफी ऊंचा हो गया है और उन्हें अध्यक्ष केपी शर्मा ओली के बाद दूसरा सबसे महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि उनकी वापसी से पार्टी को मजबूती मिलेगी और पार्टी के भीतर शक्ति संतुलन (power equation) भी बदल सकता है, जहाँ लंबे समय से ओली का दबदबा रहा है।

बिद्या भण्डारी का राजनीतिक सफर 1978 में शुरू हुआ था। 1993 में अपने पति मदन भण्डारी के निधन के बाद वह संसदीय राजनीति में आईं और काठमांडू के उपचुनाव में तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष कृष्ण प्रसाद भट्टराई को हराकर एक बड़ी जीत हासिल की थी।

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