बुधी गंडकी बाढ़ की वजह: भूस्खलन से बना अस्थायी बांध टूटा

गोरखा (नेपाल): नेपाल की बुधी गंडकी नदी घाटी में आई अचानक बाढ़ के पीछे भूस्खलन से बना एक अस्थायी बांध हो सकता है। अंतरराष्ट्रीय एकीकृत पर्वतीय विकास केंद्र (ICIMOD) ने अपनी प्रारंभिक जांच में यह संभावना जताई है। संस्था के अनुसार गोरखा जिले के चुमचेट इलाके के पास नदी का रास्ता अस्थायी रूप से रुका था, और उसके टूटने से पानी, मिट्टी और मलबा एक साथ नीचे की ओर बह निकले।
ICIMOD का अनुमान है कि 11 अक्टूबर को नेपाल के समय के अनुसार सुबह करीब चार बजे बाढ़ शुरू हुई। तेज बहाव में गाद और मलबे की मोटी परत नदी के किनारे की बस्तियों तक पहुँच गई।
अरघाट के निवासियों के लिए वह सुबह डर और भागदौड़ से भरी थी। वहाँ रहने वाली कमला दुवाड़ी ने बताया कि पुलिस सार्वजनिक घोषणाएँ करके लोगों को निकलने के लिए कह रही थी। उनके कुछ मज़दूर, जो ऊपर की ओर रहते हैं, पहले ही फोन करके बाढ़ की चेतावनी दे चुके थे। दुवाड़ी के मुताबिक, भोटेकोशी बाढ़ की याद अब भी लोगों के मन में ताज़ा है, इसलिए वे बिना देर किए पहाड़ी की ऊँचाई पर चले गए।
अब तक कितना नुकसान हुआ है
शुरुआती रिपोर्टों में कुछ लोगों के लापता होने की बात सामने आई है। कई मकान बह गए हैं, कुछ पुल टूट चुके हैं और नदी किनारे का बुनियादी ढांचा क्षतिग्रस्त हुआ है। 341 मेगावाट की बुधी गंडकी जलविद्युत परियोजना की साइट सेलेरी में भी नुकसान की खबर है, हालांकि नुकसान का पूरा आकलन अभी जारी है।
यह घटना ऐसे समय में हुई है जब इसी क्षेत्र में हाल ही में ग्यिरोंग-रासुवा आपदा भी आ चुकी है। ICIMOD ने इसे एक उदाहरण बताया है कि पहाड़ों में एक प्राकृतिक खतरा दूसरे खतरे को जन्म दे सकता है, और इससे समुदायों व ढांचे पर असर कई गुना बढ़ जाता है।
इसी घाटी में अप्रैल 2024 में भी बड़ी बाढ़ आई थी। तब मनसलू ग्लेशियर के मुहाने से एक विशाल बर्फ़ का हिमस्खलन बिरेंद्र ताल में जा गिरा था, जिससे झील का पानी अचानक बुधी गंडकी में उमड़ पड़ा था। विस्तृत जांच में पाया गया कि उस बार कारण झील के पानी का विस्थापन था, न कि ग्लेशियर झील का फटना (GLOF)।
ICIMOD के महानिदेशक पेमा ग्यामत्सो ने कहा कि फिलहाल राहत कार्य सबसे ज़रूरी प्राथमिकता है। साथ ही, यह समझना भी अहम है कि बाढ़ किस कारण से आई, क्योंकि इसी से भविष्य के जोखिम कम करने और इलाके की सहनशक्ति बढ़ाने का रास्ता तय होगा।
संस्था का कहना है कि हिमालयी नदी तंत्र में बाढ़ के कई स्रोत हो सकते हैं, इसलिए अलग-अलग खतरों पर एक साथ नज़र रखना ज़रूरी है। भूस्खलन, नदी की गतिविधि और निचले इलाकों में बसे लोगों पर असर, इन तीनों को जोड़कर देखे बिना आगे की योजना अधूरी रहेगी।