बुर्ज खलीफा पर सजी दिवाली, पर खाड़ी में फंसे 16 हजार भारतीय श्रमिकों का दर्द

दुबई के बुर्ज खलीफा पर दिवाली की बधाई दी गई, लेकिन यूएई और सऊदी में भारतीय श्रमिक वेतन और वीजा समस्याओं से जूझ रहे हैं।

Pankhuri Motani8 November 20262 min read0 viewsUAE
बुर्ज खलीफा पर सजी दिवाली, पर खाड़ी में फंसे 16 हजार भारतीय श्रमिकों का दर्द

दुबई: दुनिया की सबसे ऊंची इमारत बुर्ज खलीफा ने 7 और 8 नवंबर 2026 की रात दिवाली के मौके पर अपनी पूरी चमक बिखेरी। इमारत के बाहरी हिस्से पर अंग्रेजी और हिंदी में 'हैप्पी दिवाली' लिखा गया, जिसके साथ 'उत्सव आपके जीवन में चमक, खुशी और समृद्धि लाए' का संदेश प्रदर्शित किया गया।

इस खास मौके पर यूएई के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान और दुबई के शासक शेख मोहम्मद बिन राशिद अल मकतूम ने भी दिवाली की शुभकामनाएं दीं। बुर्ज खलीफा के आधिकारिक इंस्टाग्राम अकाउंट पर इस लाइटिंग के वीडियो साझा किए गए।

दुबई के बुर दुबई और अल मनखूल जैसे इलाकों में भारतीय समुदाय ने रंगोली और दीयों के साथ जश्न मनाया। ग्लोबल विलेज में 600 ड्रोन्स का एक भव्य शो भी आयोजित किया गया। अबू धाबी स्थित भारतीय दूतावास के मुताबिक, यूएई की कुल आबादी में लगभग 35 फीसदी भारतीय हैं, जिनकी संख्या 43 लाख से ज्यादा है।

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जश्न के बीच यूएई और सऊदी अरब में रह रहे भारतीय श्रमिकों की गंभीर समस्याएं भी सामने आई हैं। हाउस ड्राइवरों और कम कुशल श्रमिकों ने बताया कि उनसे रोजाना 12 से 16 घंटे काम लिया जा रहा है। कई श्रमिकों का वेतन 1,000 से 2,500 सऊदी रियाल (करीब 22,000 से 55,000 रुपये) के बीच फ्रीज कर दिया गया है।

श्रमिकों ने शिकायत की है कि कंपनियों के बंद होने की वजह से उनके वीजा अचानक रद्द किए जा रहे हैं। प्रभावित लोग सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर रियाद स्थित भारतीय दूतावास को टैग कर अपनी व्यथा बता रहे हैं। दूतावास ने इन लोगों को मुसनेद कॉन्ट्रैक्ट और लेबर कोर्ट की मदद लेने की सलाह दी है।

खाड़ी देशों से भारतीय नागरिकों की ओर से अब तक 16,000 से अधिक संकटकालीन कॉल (distress calls) आ चुके हैं, जिनमें सबसे ज्यादा कॉल सऊदी अरब और यूएई से आए हैं। लोग सऊदीकरण और अमीरातीकरण की नीतियों के बीच अपनी नौकरी और भविष्य को लेकर आशंकित हैं।

निर्माण, हॉस्पिटैलिटी, लॉजिस्टिक्स और घरेलू कामकाज जैसे क्षेत्रों में भारतीय श्रम पर निर्भरता के बावजूद प्रवासी कर्ज के जाल और बढ़ते इंश्योरेंस प्रीमियम जैसी चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। क्षेत्रीय संघर्षों के कारण पहले भी कई भारतीय अपनी जान गंवा चुके हैं।

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