अमेरिका के साथ रिश्ते सुधारने के लिए चीन ने ईरान से बनाई दूरी, एससीओ समिट में नहीं हुई मुलाकात.

वैश्विक प्रतिबंधों और तनाव के बीच चीन ने ईरान के साथ अपने रिश्तों को लेकर एक खास रणनीति अपनाई है। 1 सितंबर 2026 को प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक, चीन के रिसर्चर यांग शियाओतोंग ने बताया कि बीजिंग ईरान के साथ बहुत ज्यादा करीबी दिखाने से बच रहा है। इस सोची-समझी रणनीति का मुख्य मकसद अमेरिका के साथ अपने संबंधों को फिर से पटरी पर लाना है। दुनिया भर में इस कूटनीतिक बदलाव की चर्चा हो रही है, क्योंकि चीन अपने बड़े आर्थिक और भू-राजनीतिक हितों को ध्यान में रखकर हर कदम फूंक-फूंक कर रख रहा है।
बिश्केक में हुई एससीओ समिट और ईरान के राष्ट्रपति की मौजूदगी
किर्गिस्तान की राजधानी बिश्केक में 31 अगस्त और 1 सितंबर 2026 के दौरान शंघाई सहयोग संगठन (SCO) की बैठक आयोजित की गई थी। इस महत्वपूर्ण समिट में ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन ने भी हिस्सा लिया था। हालांकि ईरानी राष्ट्रपति वहां मौजूद थे, लेकिन चीनी राष्ट्रपति ने उनके साथ किसी भी तरह की औपचारिक बैठक नहीं की। दोनों देशों के विदेश मंत्रियों के बीच जरूर बातचीत हुई, लेकिन बड़े स्तर पर नेताओं का न मिलना यह साफ बताता है कि बीजिंग अभी तेहरान के साथ दूरी बनाकर चलना चाहता है। इसके विपरीत, ईरानी राष्ट्रपति ने रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ अलग से बातचीत की थी।
अमेरिका के दबाव पर चीन का कड़ा रुख
चीन की यह नीति वैचारिक मेल पर नहीं बल्कि पूरी तरह से उसके अपने आर्थिक और सुरक्षा हितों पर टिकी है। चीन अपने ऊर्जा संसाधनों यानी तेल और गैस की सप्लाई को सुरक्षित रखना चाहता है और साथ ही अमेरिका के सामने क्षेत्रीय प्रभाव को संतुलित करना चाहता है। अमेरिकी प्रतिबंधों पर बोलते हुए चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने साफ शब्दों में कहा कि अमेरिका की धमकियां बेअसर हैं और बीजिंग अपने व्यापारिक हितों की रक्षा के लिए हर जरूरी कदम उठाएगा। साथ ही, चीन ने अमेरिका को यह भरोसा भी दिया है कि वह ईरान को हथियार नहीं बेचेगा।
ईरान का रुख और क्षेत्रीय कूटनीति
एससीओ समिट के दौरान राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन ने कहा कि अगर अमेरिका अपने पुराने समझौते का सम्मान करता है, तो ईरान इस साल जून में हुए अमेरिकी युद्धविराम समझौते को मानने के लिए पूरी तरह तैयार है। दूसरी तरफ, शंघाई सहयोग संगठन ने खुलकर ईरान पर लगने वाले प्रतिबंधों और हमलों की निंदा की है। अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकारों का मानना है कि चीन खुद भी नहीं चाहता कि मध्य पूर्व क्षेत्र में ईरान की पूरी तरह से जीत हो, क्योंकि इससे खाड़ी के बाकी देश नाराज हो सकते हैं और चीन की कूटनीतिक कोशिशों को झटका लग सकता है।