सऊदी से मौत की बड़ी दुखद खबर, मक्का में सारे जायरीनो के लिए थम गई अल-मदनी की आवाज, मात्र 15 साल से दे रहे थे आजान.

मक्का: आज सुबह मक्का से एक ऐसी खबर आई जिसने पूरी इस्लामी दुनिया को गमगीन कर दिया। मस्जिद अल-हरम के मुअज़्ज़िन शेख इब्राहीम बिन आदिल अल-मदनी का बीमारी के बाद इंतकाल हो गया। सिर्फ 51 साल की उम्र में उठ गई वो आवाज़, जो सालों तक काबा के सामने खड़े लाखों ज़ायरीनों के दिलों में उतरती रही।
सबसे मार्मिक बात यह है कि उनकी आखिरी अज़ान आज सुबह की फज्र की नमाज़ के लिए ही थी — मानो अल्लाह ने उन्हें अपनी आखिरी पुकार भी अपने ही घर से बुलवाई, और फिर उन्हें अपने पास बुला लिया।
एक बच्चे की मासूम शुरुआत, जो बना हरम की पहचान
शेख इब्राहीम की कहानी किसी फिल्म से कम नहीं। उनका जन्म और परवरिश मदीना मुनव्वरा के एक धार्मिक माहौल में हुई — अल्लाह के फ़ज़ल से। उनके नाना क़ुरआन के हाफ़िज़ थे, और बचपन में उन्हीं से वे सबसे ज़्यादा प्रभावित हुए।

सिर्फ 15 साल की उम्र में, मदीना के अपने मोहल्ले की एक छोटी सी मस्जिद में उन्होंने पहली बार अज़ान दी। उस पल को कौन जानता था कि यह वही आवाज़ है जो एक दिन दुनिया की सबसे पाक जगह से गूंजेगी। वे अपने तीन पड़ोसियों के साथ बारी-बारी से अज़ान देते रहे — यह सिलसिला तब तक चला, जब तक उन्होंने कॉलेज की पढ़ाई पूरी नहीं कर ली।
सात साल का सन्नाटा, और फिर अल्लाह की तरफ से बुलावा
पढ़ाई पूरी होने के बाद ज़िंदगी ने एक नया मोड़ लिया — शहर से बाहर पढ़ाने की ज़िम्मेदारियों के चलते उन्हें अज़ान देना छोड़ना पड़ा। पूरे सात साल तक वह आवाज़ खामोश रही, जो कभी मोहल्ले की मस्जिद में गूंजा करती थी।
पर तक़दीर को कुछ और ही मंज़ूर था। 1428 हिजरी में उन्हें अल-मुदाह मस्जिद में अज़ान देने की ज़िम्मेदारी सौंपी गई। और फिर वह दिन आया, जिसे शायद उन्होंने कभी सपने में भी नहीं सोचा होगा — अल्लाह ने उन्हें मस्जिद अल-हरम, खुद काबा के सामने, अज़ान देने का शरफ बख्शा।
"मैं कौन हूं, जो इस पाक जगह में मेरी आवाज़ बुलंद हो?"
एक पुराने इंटरव्यू में शेख इब्राहीम ने बड़ी विनम्रता से अपने जज़्बात बयां किए थे। उन्होंने बताया कि जब पहली बार उन्होंने हरम में अज़ान दी, तो उस रात वे टेंशन की वजह से सो ही नहीं पाए — इतनी बड़ी ज़िम्मेदारी का एहसास उन्हें कंपा रहा था। एक साथी मुअज़्ज़िन ने उनकी अज़ान का वीडियो रिकॉर्ड किया, जिसमें तवाफ़ करते हुए ज़ायरीन नज़र आ रहे थे। जब उन्होंने वह क्लिप देखी, तो फूट-फूट कर रो पड़े और कहा —
"मैं आखिर कौन हूं, जो इस पाक जगह में मेरी आवाज़ बुलंद हो?"
24 मुअज़्ज़िनों में से एक अनमोल आवाज़
शेख इब्राहीम मस्जिद अल-हरम के 24 मुख्य मुअज़्ज़िनों में से एक थे, जिनमें से रोज़ाना 6 मुअज़्ज़िन बारी-बारी पांचों वक़्त की अज़ान और पहली फज्र की अज़ान देते हैं। वे खासतौर पर अपनी फज्र की अज़ान और तकबीरों के लिए मशहूर थे, और इमाम के पीछे "तबलीग़" (नमाज़ की हरकतों को बुलंद आवाज़ में दोहराने) की ज़िम्मेदारी भी निभाते थे।
सोशल मीडिया पर उमड़ा प्यार और आंसू
उनके इंतकाल की खबर फैलते ही सोशल मीडिया पर उनका नाम टॉप ट्रेंड करने लगा। लोग उनकी पुरानी अज़ानों और ईद की तकबीरों की रिकॉर्डिंग शेयर कर रहे हैं। एक यूज़र ने लिखा —
"आज हमने वो आवाज़ खो दी, जिससे कान मानूस थे और दिल सुकून पाते थे... अल्लाह मग़फिरत फरमाए और जन्नत-उल-फिरदौस में जगह दे।"
आज असर की नमाज़ के बाद मस्जिद अल-हरम में उनकी नमाज़-ए-जनाज़ा अदा की जानी है।