Dubai के यात्रियों पर नेपाल-तिब्बत बॉर्डर पर आया बड़ा संकट, बाल-बाल बचे कैलाश मानसरोवर यात्री

दुबई में रहने वाले कुछ भारतीय प्रवासी जो पवित्र कैलाश मानसरोवर की यात्रा पर गए थे, नेपाल और तिब्बत सीमा पर आए भयानक बाढ़ और भूस्खलन की आपदा से बाल-बाल बच गए। ये सभी यात्री उस रास्ते से ठीक 20 घंटे पहले गुजरे थे जहाँ 26 अगस्त को एक बहुत बड़ी बाढ़ ने सब कुछ पूरी तरह तबाह कर दिया। आम रास्ते पूरी तरह बंद होने के कारण इन यात्रियों को एक खास आपातकालीन रास्ते का इस्तेमाल करना पड़ा जो आमतौर पर सेना के आने-जाने के लिए ही खुला रहता है। इस मुश्किल रास्ते पर उन्हें भारी परेशानियों और खतरनाक पहाड़ों का सामना करना पड़ा।
नेपाल पुलिस और अधिकारियों की जानकारी
नेपाल पुलिस की रिपोर्ट के अनुसार 2 सितंबर 2026 की सुबह तक सोतेकोशी और त्रिशूली नदी में आई इस भयानक बाढ़ से मरने वालों की संख्या बढ़कर 1,127 हो गई है और करीब 4,858 लोग अभी भी लापता बताए जा रहे हैं। इस प्राकृतिक आपदा की वजह से रसुवा, नुवाकोट, धाडिंग, चितवन, गोरखा, तनहुन और नवलपरासी जैसे कई इलाके बुरी तरह प्रभावित हुए हैं। इन जगहों पर पुल, सड़कें और बिजली बनाने वाली परियोजनाएं पूरी तरह से नष्ट हो चुकी हैं। बाढ़ की वजह से स्थानीय लोगों के साथ-साथ बाहर से आए पर्यटकों और तीर्थयात्रियों को भी भारी समस्याओं का सामना करना पड़ा है।
दुबई के यात्रियों की डरावनी दास्तान
दुबई में रहने वाली मोहाना सौम्या ने अपनी यह धार्मिक यात्रा 17 अगस्त को शुरू की थी और वह नेपाल के रसुवा जिले के रास्ते तिब्बत पहुँची थीं। अपनी तीन दिन की यात्रा पूरी करने के बाद उन्हें 27 अगस्त को वापस लौटना था, लेकिन 26 अगस्त को आए मलबे के सैलाब ने उनके सारे प्लान बदल दिए। मूल रास्ता कट जाने की वजह से वह सागा इलाके में ही फंस गई थीं, जिसके बाद चीनी अधिकारियों की अनुमति से उन्हें एक इमरजेंसी रास्ते के जरिए बाहर निकाला गया। इस कठिन सफर के दौरान उन्हें कई जगह गाड़ियां छोड़कर स्थानीय पोर्टर्स यानी कुलियों की मदद से पहाड़ों की ढलानों पर पैदल चलना पड़ा। आखिरकार उनका यह समूह 28 अगस्त की रात करीब 9:30 बजे काठमांडू पहुँच गया।
दूसरा दल भी फंसा और किया संघर्ष
दुबई के पूर्व स्कूल हेड इना बनर्जी के साथ 58 लोगों का एक दूसरा समूह भी इसी तरह की भारी कठिनाइयों से गुजरा। इस दल में भारत, कनाडा और थाईलैंड के यात्री शामिल थे जो आपदा से ठीक पहले केरुंग बॉर्डर को पार कर चुके थे। इस समूह को भी एक वैकल्पिक रास्ते से वापस आना पड़ा और एक जगह पर तो उन्हें 1.5 किलोमीटर तक घुटनों तक की कीचड़ और दलदल में पैदल चलना पड़ा। इना बनर्जी ने बताया कि जिस ड्राइवर ने उनकी गाड़ी को काठमांडू से तिरे तक पहुँचाया था, वह अपनी गाड़ी समेत बाढ़ में बह गया और जिस रेस्टोरेंट में उन्होंने कुछ समय पहले खाना खाया था, वह भी पूरी तरह जमींदोज हो गया।
रसुवागढा बॉर्डर का रास्ता अभी भी बहुत ज्यादा खराब स्थिति में है और काठमांडू से जुड़ने वाले मुख्य रास्तों पर केवल आने-जाने के लिए अस्थायी व्यवस्था ही बन पाई है। खराब मौसम और लगातार हो रही बारिश की वजह से पहाड़ अभी भी काफी कमजोर हैं, जिसके चलते अधिकारी लगातार पानी के स्तर और रास्तों पर नजर बनाए हुए हैं। दुबई और खाड़ी देशों से अपने परिवार और काम छोड़कर इस यात्रा पर जाने वाले भारतीय प्रवासियों के लिए यह अनुभव जिंदगी का सबसे डरावना सपना बन गया है।