भारत के सिंधु जल समझौते के फैसले पर जिनेवा में अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों का समर्थन

Aanya17 September 20263 min read22 viewsIndia
भारत के सिंधु जल समझौते के फैसले पर जिनेवा में अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों का समर्थन

जिनेवा में संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद की बैठक के दौरान आयोजित एक विशेष सम्मेलन में अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों ने भारत के उस फैसले का समर्थन किया है जिसमें सिंधु जल समझौते को स्थगित रखने की बात कही गई है। इस कार्यक्रम में वक्ताओं ने साफ कहा कि इस पूरे मामले को केवल दो देशों के बीच का विषय नहीं मानना चाहिए, बल्कि इसे क्षेत्रीय सुरक्षा, मानवाधिकार और स्थानीय लोगों के पानी के अधिकारों के साथ जोड़कर देखने की जरूरत है। यह आयोजन भारतीय नागरिक समाज संगठन 'शिवा डेवलपमेंट सोसाइटी' द्वारा किया गया था।

सिंधु जल समझौते पर क्यों उठ रहे हैं सवाल

ब्रसेल्स के साउथ एशिया डेमोक्रेटिक फोरम के रिसर्च डायरेक्टर डॉ. सीगफ्रीड ओ. वोल्फ ने सम्मेलन के दौरान अपनी बात रखते हुए कहा कि भारत के पास पूरी तरह से यह संप्रभु अधिकार है कि वह इस समझौते की समीक्षा की मांग कर सके। उनका यह भी मानना था कि पाकिस्तान के रविकै कारण इस समझौते के मूल उद्देश्य और भावना को नुकसान पहुंचा है। उन्होंने समझौते में मौजूद संरचनात्मक असमानताओं का भी जिक्र किया, जिसमें पानी के बंटवारे से लेकर भारत के वित्तीय योगदान और बुनियादी ढांचे से जुड़ी पाबंदियां शामिल हैं।

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पाकिस्तान द्वारा भारत की हाइड्रोपावर परियोजनाओं को लेकर जताई गई चिंताओं पर बात करते हुए डॉ. वोल्फ ने कहा कि भारत नदियों के पानी को पूरी तरह रोक नहीं रहा है। उन्होंने इसे एक इंजीनियरिंग मिथक बताया और स्पष्ट किया कि बिजली बनाने की ये परियोजनाएं ऐसी होती हैं जिनमें पानी की खपत नहीं होती है और इस्तेमाल के बाद पानी को वापस नीचे की तरफ छोड़ दिया जाता है। उन्होंने यह भी कहा कि पाकिस्तान में पानी की जो कमी हो रही है, उसके पीछे घरेलू कारण ज्यादा जिम्मेदार हैं, जैसे कि पुरानी कृषि पद्धतियां, जमीन का मालिकाना हक और पुरानी हो चुकी नहर व्यवस्था।

स्थानीय समुदायों और मानवाधिकारों पर जोर

लंदन के मानवाधिकार कार्यकर्ता आरिफ आज़ाकिया ने कार्यक्रम में हिस्सा लेते हुए कहा कि पानी तक पहुंच हर इंसान का बुनियादी अधिकार है। उन्होंने पाकिस्तान के भीतर, खासकर सिंध प्रांत में पानी के असमान वितरण को लेकर अपनी चिंता जाहिर की। जिनेवा के मानवाधिकार विशेषज्ञ मामून रहमान ने भी इस बात पर जोर दिया कि ट्रांसबाउंड्री वॉटर गवर्नेंस यानी आर-पार जल प्रबंधन के दौरान दोनों तरफ के प्रभावित समुदायों का खास ख्याल रखा जाना चाहिए।

वर्ल्ड सिंधी कांग्रेस के चेयरपर्सन लाखू लुवाना ने अपने वीडियो संदेश में बताया कि सिंध और बलूच इलाकों में प्राकृतिक संसाधनों और पानी के इस्तेमाल को लेकर लंबे समय से चिंताएं बनी हुई हैं। उन्होंने कहा कि ये समस्याएं किसी एक द्विपक्षीय समझौते से कहीं ज्यादा बड़ी हैं और स्थानीय लोगों के हक की आवाज हमेशा उठनी चाहिए।

भारत और स्थानीय नागरिकों के अधिकार सबसे ऊपर

इस सम्मेलन की अध्यक्षता करने वाले 'शिवा डेवलपमेंट सोसाइटी' के कार्यकारी निदेशक नरेन्दर कुमार ने कहा कि सिंधु जल समझौते पर बहस को सिर्फ भारत और पाकिस्तान के रिश्तों तक सीमित नहीं रखना चाहिए। उन्होंने जोर देकर कहा कि इस सिस्टम पर निर्भर रहने वाले आम लोगों और भारतीय समुदायों की पानी की जरूरतों को भी मान्यता मिलनी चाहिए। उन्होंने मांग की कि इस पूरे मामले में मानवाधिकार, पानी का सही बंटवारा, स्थानीय लोगों की भागीदारी और टिकाऊ जल प्रबंधन को सबसे आगे रखा जाना चाहिए। इस संबंध में अधिक जानकारी के लिए आप ANI News की आधिकारिक रिपोर्ट देख सकते हैं।

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