गाजा के स्कूलों में AI से होगी निगरानी, प्राइवेसी को लेकर बढ़ा विवाद

गजा में बच्चों की शिक्षा के लिए काम कर रही एक अमेरिकी चैरिटी, 'गाजा चिल्ड्रन विलेज' ने अपने स्कूलों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) आधारित सॉफ्टवेयर लागू करने की योजना बनाई है। इस कदम का मकसद मध्य और दक्षिणी गाजा में स्थित 'एकेडमी ऑफ होप' स्कूलों के भीतर क्लासरूम की बातचीत पर नजर रखना है। संस्था का दावा है कि इस तकनीक के जरिए "यहूदी विरोधी" (anti-Semitism), "उकसावे" और "नफरत भरे भाषणों" की पहचान की जाएगी।
यह मामला तब सामने आया जब चैरिटी के संस्थापक डॉ. डेविड हसन ने एक वेबिनार के दौरान इस पहल की जानकारी दी। डॉ. डेविड हसन, जो कुवैत में जन्मे एक न्यूरोसर्जन हैं और ड्यूक यूनिवर्सिटी मेडिकल स्कूल के सदस्य हैं, उनका कहना है कि इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य शैक्षिक माहौल से कट्टरपंथ को खत्म करना है। ये स्कूल पिछले साल गर्मियों में शुरू हुए थे, जहाँ उन हजारों बच्चों को पढ़ाया जा रहा है जिन्होंने युद्ध में अपने परिवार खो दिए या जो विस्थापित हुए हैं।
निगरानी तकनीक पर उठे गंभीर सवाल
डॉ. हसन के अनुसार, स्कूलों का पाठ्यक्रम फिलिस्तीनी अथॉरिटी के ढांचे पर आधारित है, लेकिन इसमें कुछ बदलाव किए गए हैं। उनका कहना है कि उन हिस्सों को हटा दिया गया है जो हिंसा का महिमामंडन करते हैं या इजरायल विरोधी भावनाओं को बढ़ावा देते हैं, हालांकि उन्होंने इन बदलावों के ठोस उदाहरण देने से इनकार कर दिया।
इस निगरानी तकनीक के इस्तेमाल ने मानवाधिकार समूहों और सहायता संगठनों के बीच एक बड़ी बहस छेड़ दी है। आलोचकों का मानना है कि क्लासरूम में रिकॉर्डिंग उपकरणों का उपयोग करना प्राइवेसी का उल्लंघन है। एक सहयोगी सहायता समूह ने इसे "पेंडोरा बॉक्स" (मुसीबतों का पिटारा) करार देते हुए कहा कि इस कदम के बाद वे चैरिटी के साथ अपने सहयोग पर पुनर्विचार कर सकते हैं।
सबसे बड़ी चिंता इस बात की है कि यह प्रोजेक्ट स्थानीय अधिकारियों या संयुक्त राष्ट्र (UN) की एजेंसियों के प्रति जवाबदेह नहीं है, जो आमतौर पर गाजा के शैक्षिक ढांचे की देखरेख करते हैं। साथ ही, इस बात का डर भी जताया जा रहा है कि इस डेटा का दुरुपयोग हो सकता है, क्योंकि अतीत में इजरायली सेना ने टारगेट तय करने के लिए संचार विश्लेषण हेतु AI का उपयोग किया है।
हालांकि 'गाजा चिल्ड्रन विलेज' का कहना है कि वे रिकॉर्डिंग किसी बाहरी पक्ष के साथ साझा नहीं करेंगे, लेकिन अभी तक यह साफ नहीं है कि यह निगरानी कब से शुरू होगी और "नफरत भरी भाषा" को पहचानने के पैमाने क्या होंगे। यह भी स्पष्ट नहीं है कि क्या छात्रों, शिक्षकों और उनके परिवारों की इस सर्विलांस के लिए सहमति ली गई है।
गौरतलब है कि यह चैरिटी मुख्य रूप से अमेरिकी यहूदियों सहित व्यक्तिगत दाताओं द्वारा वित्तपोषित है। यह संस्था उत्तरी अमेरिकी, इजरायली और यूरोपीय सहायता संगठनों के साथ साझेदारी कर छात्रों को शिक्षा के साथ-साथ भोजन, चिकित्सा देखभाल और मनोवैज्ञानिक सहायता भी प्रदान कर रही है।