गाजा में युद्धविराम के एक साल बाद भी स्वास्थ्य व्यवस्था चरमराई

गाजा। युद्धविराम की घोषणा को एक साल बीत चुका है, लेकिन गाजा की स्वास्थ्य व्यवस्था अब भी गंभीर संकट में फंसी हुई है। अंतरराष्ट्रीय संगठनों और मानवाधिकार समूहों के आकलन बताते हैं कि न इलाज की सुविधाएं पटरी पर लौटी हैं और न ही गंभीर मरीज़ों को समय पर बाहर भेजा जा पा रहा है। हालात सुधरने की जो उम्मीद थी, वह अब तक पूरी होती नहीं दिख रही।
फ़िलिस्तीन के स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार, गाजा में ज़रूरी दवाओं में से 44 प्रतिशत का स्टॉक शून्य हो चुका है, जबकि मेडिकल उपभोग की 54 प्रतिशत चीज़ें उपलब्ध नहीं हैं। फిजिशियन्स फॉर ह्यूमन राइट्स इज़राइल (PHRI) के आंकड़े भी इसी तस्वीर की पुष्टि करते हैं। इनके मुताबिक़ इलाक़े का कोई भी अस्पताल पूरी तरह काम करने की स्थिति में नहीं है। युद्धविराम के बाद गहन चिकित्सा (ICU) बिस्तरों की संख्या में सिर्फ़ एक का इज़ाफ़ा हुआ और अब यह 104 है। डायग्नोस्टिक इमेजिंग उपकरणों में 74 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है।
सप्लाई रोके जाने की वजह
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के महानिदेशक टेड्रोस अधनोम घेब्रेयेसस ने 7 अक्टूबर 2026 को मेडिकल सामान की लगातार आपूर्ति की ज़रूरत पर ज़ोर दिया। संगठन के फ़िलिस्तीन प्रतिनिधि डॉ. राइनहिल्डे वैन डे वीर्ड्ट के अनुसार, कई ज़रूरी चीज़ें "ड्यूअल-यूज़" यानी दोहरे उपयोग वाली श्रेणी में रखे जाने के कारण बार-बार रोक दी जाती हैं। ReliefWeb की एक रिपोर्ट बताती है कि मेडिकल सप्लाई को क्लीयरेंस मिलने में औसतन 74 दिन लग रहे हैं। मेडेसिन्स सैंस फ्रontières (MSF) ने 5 अक्टूबर 2026 को कहा कि ऑक्सीजन सिलेंडर, बैसाखी और व्हीलचेयर जैसी बुनियादी चीज़ों पर भी इज़राइली अधिकारियों की रोक बनी हुई है।
युद्धविराम के बाद अब तक 1,470 से ज़्यादा लोगों के मारे जाने की बात कही गई है। इसके अलावा 15,000 से अधिक मरीज़ मेडिकल इवैक्युएशन की प्रतीक्षा सूची में हैं। अक्टूबर 2023 से जुलाई 2026 के बीच कम से कम 1,570 मरीज़ इलाज के लिए बाहर भेजे जाने का इंतज़ार करते हुए जान गंवा चुके हैं। इनमें 505 कैंसर मरीज़ और 264 बच्चे शामिल हैं।
इज़राइली हाईकोर्ट ने जुलाई 2026 में राज्य की इवैक्युएशन नीति में दखल देने से इनकार कर दिया था, लेकिन सरकार से 21 दिसंबर 2026 तक अपडेट मांगा है। वर्तमान नियमों के तहत मरीज़ों को पश्चिमी तट और पूर्वी यरुशलम ले जाने पर रोक है, और इवैक्युएशन केवल तीसरे देशों तक ही संभव है। सवाल यही है कि इस स्थिति में मरीज़ों को सही इलाज कब और कहां मिल पाएगा।