गाजा में भीषण तबाही: 82% इमारतें मलबे में तब्दील, 19.8 लाख लोग बेघर

गाजा पट्टी इस समय एक ऐसे मानवीय संकट से गुजर रही है जिसे शब्दों में बयां करना मुश्किल है। संयुक्त राष्ट्र मानवीय मामलों के समन्वय कार्यालय (OCHA) की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, गाजा में तबाही का मंजर इतना भयानक है कि वहां की लगभग 82% इमारतें पूरी तरह नष्ट हो चुकी हैं। कई इलाके तो नक्शे से ही मिट चुके हैं, जिससे वहां रहने वाले लोगों के पास अब सिर छुपाने के लिए कोई जगह नहीं बची है।
आंकड़ों की बात करें तो 7 अक्टूबर 2026 तक करीब 19.8 लाख फिलिस्तीनी विस्थापित हो चुके हैं। यह गाजा की कुल आबादी का लगभग 90% हिस्सा है। UNOSAT के डेटा से पता चलता है कि 2 लाख से ज्यादा ढांचों को नुकसान पहुंचा है, जिनमें से 1.34 लाख से अधिक पूरी तरह तबाह हो चुके हैं। सबसे दुखद बात यह है कि अक्टूबर 2025 में युद्धविराम का समझौता होने के बावजूद हिंसा पूरी तरह नहीं रुकी। रिपोर्ट्स के मुताबिक, समझौते के बाद के 361 दिनों में से 325 दिनों तक इजरायली हमले जारी रहे, जिसमें हाल ही में बेत लहिया और खान यूनिस में हुए हमलों में दो और लोगों की जान चली गई।
बर्बादी की हद: शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था ध्वस्त
इस युद्ध ने न केवल इमारतों को, बल्कि आने वाली पीढ़ी के भविष्य को भी मलबे में मिला दिया है। गाजा के 93% से ज्यादा स्कूलों को पूरी तरह से दोबारा बनाने की जरूरत है, जिसकी वजह से 7 लाख से अधिक छात्रों की पढ़ाई ठप हो गई है। बुनियादी सुविधाओं का हाल यह है कि 91% परिवार पानी की भारी किल्लत से जूझ रहे हैं क्योंकि पूरा इंफ्रास्ट्रक्चर ढह चुका है।
फिलिस्तीनी स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार, इस संघर्ष में अब तक 74,000 से अधिक लोग मारे जा चुके हैं और 1.75 लाख से ज्यादा घायल हुए हैं। अकेले अक्टूबर 2025 के युद्धविराम के बाद से 1,460 लोग मारे गए और 5,116 घायल हुए। यूनिसेफ (UNICEF) ने एक दिल दहला देने वाला खुलासा किया है कि युद्धविराम की घोषणा के बाद के 300 दिनों में कम से कम 300 बच्चों की जान गई है।
प्लान इंटरनेशनल के कंट्री डायरेक्टर डॉ. उन्नी कृष्णन ने इस स्थिति पर गहरा दुख जताते हुए कहा कि जीवन रक्षक सहायता पहुंचाने में विफलता और युद्धविराम के टूटे हुए वादों की कीमत एक पूरी पीढ़ी अपने बचपन और भविष्य को खोकर चुका रही है। अब जैसे-जैसे सर्दियां करीब आ रही हैं, बेघर लोग बाढ़, भीड़भाड़ और संक्रामक बीमारियों के गंभीर खतरे के बीच जीने को मजबूर हैं।