तेल पर निर्भरता कम कर ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ रहे हैं सऊदी अरब और यूएई समेत खाड़ी देश

रियाद: सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, कतर, कुवैत, ओमान और बहरीन जैसे खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) के देश अब अपनी अर्थव्यवस्था को बदलने की तैयारी में हैं। ये देश अब पूरी तरह से तेल और गैस पर निर्भर रहने के बजाय ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ रहे हैं। इसके लिए सऊदी विजन 2030, यूएई सेंटेनरी 2071 और कतर नेशनल विजन 2030 जैसे आधुनिक एजेंडे लागू किए जा रहे हैं।
क्षेत्र के सॉवरेन वेल्थ फंड्स 4 ट्रिलियन से 6 ट्रिलियन डॉलर के बीच की राशि का प्रबंधन कर रहे हैं। ऊर्जा की कीमतों में होने वाले उतार-चढ़ाव के जोखिम को कम करने के लिए साल 2026 में अब तक अलग-अलग सेक्टरों में 53.9 बिलियन डॉलर का निवेश किया जा चुका है। अकेले सऊदी अरब ने 1 ट्रिलियन डॉलर से ज्यादा के मेगा प्रोजेक्ट्स की घोषणा की है।
आंकड़ों के मुताबिक, यूएई की कुल जीडीपी में गैर-तेल क्षेत्र की हिस्सेदारी 70 प्रतिशत से ज्यादा हो गई है, जबकि सऊदी अरब में यह करीब 50 प्रतिशत है। यूएई ने साल 2023 में 22 बिलियन डॉलर से अधिक का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) आकर्षित किया है।
मानव पूंजी के विकास पर भी काफी जोर दिया जा रहा है। कतर की तीसरी राष्ट्रीय विकास रणनीति (2024-2030) के चलते वह 2026 के क्वालिटी ऑफ लाइफ इंडेक्स में दुनिया में 12वें और स्टैंडर्ड ऑफ लिविंग इंडेक्स में चौथे स्थान पर रहा है। शुरा काउंसिल सदस्य डॉ. मुना अल-मुसलमानी और शिक्षा विशेषज्ञ डॉ. सालेह अल-इब्राहिम ने इन रैंकिंग्स का श्रेय स्वास्थ्य, शिक्षा और सुरक्षित बुनियादी ढांचे में किए गए दीर्घकालिक निवेश को दिया है।
यूएई के 'नफिस' प्रोग्राम के जरिए जनवरी 2026 तक 1.76 लाख से अधिक अमीरातियों को निजी क्षेत्र में शामिल किया गया है। अब 58 प्रतिशत स्नातक निजी क्षेत्र में करियर बनाना पसंद कर रहे हैं। वहीं दुबई कम्युनिटी डेवलपमेंट अथॉरिटी के मुताबिक 96.4 प्रतिशत निवासी अपने समुदाय पर गर्व महसूस करते हैं।
क्षेत्रीय सहयोग को बढ़ावा देने के लिए अप्रैल 2026 में अरब गल्फ प्रोग्राम फॉर डेवलपमेंट (AGFUND) और संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) के बीच साझेदारी हुई है। इसका मकसद ग्रीन फाइनेंसिंग और मानव विकास रिपोर्टिंग को मजबूत करना है। UNDP के डॉ. अब्दुल्ला अल दरदारी ने बताया कि ये पहल क्षेत्र के भविष्य को रणनीतिक रूप से आकार देने के लिए की गई हैं।
इन प्रगतियों के बीच कुछ चुनौतियां भी हैं। पीटरसन इंस्टीट्यूट फॉर इंटरनेशनल इकोनॉमिक्स की रिपोर्ट के अनुसार, ईरान के साथ क्षेत्रीय भू-राजनीतिक तनाव का असर करीब 4 ट्रिलियन डॉलर के निवेश वादों पर पड़ सकता है, क्योंकि रक्षा खर्चों की जरूरत बढ़ रही है।
सेंट्रल बैंकिंग डेटा के मुताबिक, सरकारी खर्च का करीब 84 प्रतिशत हिस्सा नियमित खर्चों पर जा रहा है, जिससे पता चलता है कि राजकोषीय नीति में अभी भी कल्याणकारी योजनाओं को प्राथमिकता दी जा रही है।