IAEA का बड़ा कदम, ईरान का परमाणु कार्यक्रम यूएन सुरक्षा परिषद को भेजा, चीन और रूस ने किया विरोध.

अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी यानी IAEA के बोर्ड ऑफ गवर्नर्स ने बुधवार, 9 सितंबर 2026 को ईरान को आधिकारिक तौर पर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में रिपोर्ट करने के लिए मतदान किया। दो दशकों में ऐसा पहली बार हुआ है जब ईरान के परमाणु कार्यक्रम को इस तरह से यूएन के पास भेजा गया है। इस प्रस्ताव को अमेरिका, यूनाइटेड किंगडम, फ्रांस और जर्मनी (E3+US) द्वारा शुरू किया गया था। इस प्रस्ताव को 23 वोट पक्ष में मिले, जबकि 3 वोट इसके खिलाफ पड़े और 8 देशों ने इसमें वोटिंग से दूरी बनाई। चीन, रूस और नाइजर ने इस प्रस्ताव के खिलाफ मतदान किया।
यूरेनियम के निशानों पर बढ़ा विवाद
यह मामला ईरान के विभिन्न परमाणु स्थलों पर निरीक्षकों द्वारा पाए गए बिना घोषित यूरेनियम के निशानों और परमाणु सुविधाओं तक सीमित पहुंच को लेकर चल रही लंबी जांच के बाद सामने आया है। IAEA के महानिदेशक Rafael Grossi ने बोर्ड को जानकारी दी कि एजेंसी ने पहले से घोषित यूरेनियम स्टॉक के बारे में जानकारी खो दी है। एजेंसी एक साल से अधिक समय से परमाणु सामग्री का सत्यापन करने में असमर्थ रही है। Grossi ने इस स्थिति को एक गंभीर प्रसार चिंता करार दिया जिसमें तुरंत सुधार करने की आवश्यकता बताई गई है।
चीन, रूस और ईरान की संयुक्त प्रतिक्रिया
मतदान से पहले चीन, ईरान और रूस ने एक संयुक्त बयान जारी किया जिसमें इस प्रस्ताव की कड़ी निंदा की गई। उन्होंने इसे कानूनी रूप से आधारहीन, राजनीतिक रूप से प्रेरित और दूर की कौड़ी बताया। उन्होंने चेतावनी दी कि इस कदम से क्षेत्रीय तनाव बढ़ेगा और चल रहे कूटनीति प्रयास बाधित होंगे। वियना में ईरान के मिशन ने इस फैसले को पक्षपाती और राजनीतिक करार दिया। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता Esmaeil Baghaei ने कहा कि निरीक्षकों पर लगाए गए प्रतिबंध अमेरिका और इजराइली हमलों का जवाब थे। उन्होंने चेतावनी दी कि तेहरान इस प्रस्ताव के जवाब में आवश्यक कदम उठाएगा।
क्षेत्रीय तनाव और आगे की स्थिति
यह कूटनीतिक गतिरोध व्यापक संघर्ष के माहौल के बीच सामने आया है जिसमें अमेरिका द्वारा ईरानी तेल टैंकरों को नष्ट करना और उसके बाद अमेरिकी ठिकानों पर ईरानी हमले शामिल हैं। हालांकि IAEA ने औपचारिक रूप से मामले को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद को भेज दिया है, लेकिन विशेषज्ञों का सुझाव है कि चीन और रूस जैसे स्थायी सदस्यों के पास मौजूद वीटो पावर के कारण बड़े दंडात्मक उपाय होने की संभावना अभी कम है। खाड़ी देशों में काम करने वाले प्रवासियों और आम नागरिकों के लिए इस तरह के तनावों पर नजर रखना जरूरी है क्योंकि इससे क्षेत्रीय सुरक्षा पर सीधा असर पड़ता है।