मिडिल ईस्ट सुरक्षा में भारत की बढ़ती भूमिका, समुद्री खतरों के बीच रणनीति तैयार
समुद्री खतरों के बीच भारत मिडिल ईस्ट में अपनी सुरक्षा और कूटनीतिक पकड़ मजबूत कर सकता है। जानें क्वाड देशों की नई रणनीति।

नई दिल्ली: मिडिल ईस्ट में बढ़ते समुद्री खतरों के बीच भारत के पास अपनी कूटनीतिक और सुरक्षा उपस्थिति को मजबूत करने का एक बड़ा रणनीतिक मौका है। भू-राजनीतिक विश्लेषक और राष्ट्रीय सुरक्षा शोधकर्ता इरीना सुकरमैन के मुताबिक, भारत इजरायल, ईरान, सऊदी अरब, यूएई और यूरोपीय साझेदारों के साथ अपने रिश्तों का इस्तेमाल कर हॉर्मुज जलडमरूमध्य और लाल सागर में बढ़ते खतरों से निपट सकता है।
इस दिशा में भारत सऊदी अरब और यूएई के साथ खुफिया जानकारी साझा करने की प्रक्रिया को तेज कर सकता है। इसके साथ ही समुद्री गतिविधियों पर नजर रखने के लिए P-8I निगरानी विमानों की तैनाती और वाणिज्यिक जहाजों के लिए समन्वित नौसैनिक एस्कॉर्ट की संभावना पर विचार किया जा रहा है।
भारत चाबहार बंदरगाह पर अपने हितों की रक्षा के लिए तेहरान के साथ अपने संबंधों का लाभ उठाने की तैयारी में है। वहीं, गाजा की सुरक्षा और पुनर्निर्माण से जुड़ी भविष्य की चर्चाओं को प्रभावित करने के लिए इजरायल और फिलिस्तीनी प्रतिनिधियों के साथ भी संपर्क बनाए रखा जाएगा।
अटलांटा में जी20 विदेश मंत्रियों की बैठक के दौरान क्वाड देशों—अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया और भारत—के बीच परामर्श हुआ। इन देशों ने हॉर्मुज जलडमरूमध्य, लाल सागर और बाब अल-मंडेब जलडमरूमध्य में नौवहन अधिकारों को सुरक्षित रखने की अपनी प्रतिबद्धता दोहराई और UNCLOS के अनुसार जहाजों के सुरक्षित मार्ग की मांग की।
क्वाड की परिचालन पहलों के तहत 'सी ड्रैगन 2027' के दौरान 'इंडो-पैसिफिक मैरीटाइम सर्विलांस कोलैबोरेशन' अभ्यास आयोजित किया जाएगा। इसके अलावा, MAITRI फ्रेमवर्क के तहत 2027 की शुरुआत में पहले 'क्वाड मैरीटाइम डोमेन अवेयरनेस ट्रैक 1.5 सिम्पोजियम' का आयोजन होगा।
नवंबर 2026 में होने वाले भारत के वार्षिक मानवीय सहायता और आपदा राहत अभ्यास में ऑस्ट्रेलिया, जापान और अमेरिका पर्यवेक्षक के रूप में शामिल होंगे।
क्षेत्रीय अस्थिरता और हूतियों के हमलों ने वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति और व्यापार को प्रभावित किया है। इसका असर भारतीय निर्यातकों पर भी पड़ा है, जिससे बीमा प्रीमियम बढ़ गया है, जहाजों के रूट बदलने की लागत बढ़ी है और सप्लाई चेन में देरी हो रही है। आपूर्ति श्रृंखला को बनाए रखने के लिए सऊदी अरब अब ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन पर रणनीतिक विकल्प के तौर पर भरोसा बढ़ा रहा है।