India में गहराया सूखा संकट, 2009 के बाद सबसे कम मानसूनी बारिश होने की आशंका.

भारत इस साल अपने सबसे कमजोर मानसूनी सीजन की तरफ तेजी से बढ़ रहा है, जिससे खेती और खाने-पीने की चीजों के दाम पर बड़ा असर पड़ने का खतरा पैदा हो गया है। मौसम से जुड़ी इस खतरनाक स्थिति के पीछे El Niño वेदर पैटर्न को मुख्य वजह बताया जा रहा है, जो लगातार बारिश को रोकने का काम कर रहा है। देश में किसानों और आम आदमी के लिए यह समय काफी चिंताजनक बनता जा रहा है क्योंकि मानसून की यह बेरुखी देश की अर्थव्यवस्था पर भारी पड़ रही है।
मानसून के आंकड़ों में भारी गिरावट
भारत मौसम विज्ञान विभाग यानी IMD के आंकड़ों के मुताबिक, जून से सितंबर तक होने वाली कुल बारिश अपने सामान्य औसत से 15% नीचे चल रही है। अगर बारिश की यह कमी ऐसे ही बनी रहती है, तो यह साल 2009 के बाद सबसे खराब मानसून प्रदर्शन होगा, जब बारिश का स्तर सामान्य से 18% कम दर्ज किया गया था। इस साल मई के महीने में मौसम विभाग ने शुरुआती अनुमान लगाया था कि इस सीजन में सिर्फ 10% की कमी आ सकती है, लेकिन हालात उससे कहीं ज्यादा गंभीर होते नजर आ रहे हैं।
चक्रवात से थोड़ी राहत की उम्मीद
ऑस्टेलिया की कंसल्टेंसी कंपनी ग्लोबल वेदर क्लाइमेट एनालिटिक्स के मैनेजिंग डायरेक्टर Christian Werner ने जानकारी दी है कि सितंबर के आखिरी हफ्ते में बंगाल की खाड़ी में एक ट्रॉपिकल साइक्लोन के लिए माहौल अनुकूल बन सकता है। ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के हवाले से उन्होंने बताया कि इस तूफान से पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत को कुछ जरूरी नमी मिल सकती है जिससे स्थानीय स्तर पर पानी की कमी से कुछ राहत मिल सकती है। हालांकि उन्होंने यह भी साफ कर दिया है कि इस तूफान से देश भर की बारिश की स्थिति में कोई बहुत बड़ा बदलाव नहीं आएगा और पूरे सीजन का घाटा 13% से 16% के बीच ही रहने की उम्मीद है।
Lancaster University की भविष्यवाणी
यूनाइटेड किंगडम की लैंकेस्टर यूनिवर्सिटी के विशेषज्ञों ने CRUCIAL प्रेडिक्शन प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करके मानसून के आखिरी दो हफ्तों की स्थिति का आकलन किया है। इस प्लेटफॉर्म के संस्थापक और प्लैनेटरी साइंटिस्ट Mark Roulston के अनुसार, इस बात की 68% संभावना है कि यह मानसून सीजन 10% से 20% तक के बारिश के घाटे के साथ खत्म होगा।
कृषि और महंगाई पर सीधा असर
भारत के खेती-किसानी के सेक्टर के लिए मानसून सबसे अहम जरिया है क्योंकि देश की अधिकांश खेती इसी बारिश पर निर्भर करती है और करोड़ों किसान सिंचाई के लिए मानसून के पानी का इंतजार करते हैं। भारत दुनिया भर में चीनी, चावल और कपास के सबसे बड़े उत्पादकों में शामिल है। बारिश की कमी की वजह से न सिर्फ मौजूदा फसलें बल्कि आने वाले समय की फसल चक्र पर भी संकट मंडरा रहा है। खाने-पीने की चीजों के दाम लगातार बढ़ रहे हैं और महंगाई लगातार सातवें महीने बढ़ती हुई अगस्त के महीने में साल के सबसे ऊंचे स्तर 5.95% पर पहुंच गई। मक्का, गन्ना और चावल की बुआई भी पिछले साल के मुकाबले पीछे चल रही है।
सरकार उठा रही है कड़े कदम
QuantEco की इकोनॉमिस्ट Yuvika Singhal ने बताया कि सामान्य स्तर के मुकाबले बारिश में हर 1% की गिरावट होने पर खाने-पीने की महंगाई लगभग 25 बेसिस पॉइंट्स तक बढ़ जाती है। बारिश कम होने और लगातार बढ़ती कीमतों को काबू में रखने के लिए सरकार ने देश में सप्लाई को ठीक रखने के लिए बिना किसी ड्यूटी के चीनी के आयात की मंजूरी दे दी है। इसके अलावा प्रशासन ने कई राज्यों में आम लोगों को राहत देने के लिए रियायती दामों पर प्याज बेचना भी शुरू कर दिया है ताकि बढ़ती महंगाई से कुछ हद तक राहत मिल सके।