होरमुज जलडमरूमध्य में तनाव से भारत का क्रूड बास्केट 131 डॉलर पर पहुंचा, आम आदमी पर बढ़ रहा बोझ

Aanya16 September 20264 min read55 viewsIndia
होरमुज जलडमरूमध्य में तनाव से भारत का क्रूड बास्केट 131 डॉलर पर पहुंचा, आम आदमी पर बढ़ रहा बोझ

पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और सप्लाई चेन में लगातार आ रही रुकावटों के कारण भारत का क्रूड ऑयल बास्केट 15 सितंबर को उछलकर 131.19 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया है। इस भारी तेजी के कारण सरकार की वित्तीय स्थिति पर दबाव बढ़ गया है और सरकारी तेल कंपनियों का मुनाफा भी काफी कम हो गया है। आर्थिक मोर्चे पर आई इस अचानक तेजी से आम जनता की जेब पर भी आने वाले दिनों में असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है क्योंकि देश को अब कच्चे तेल के लिए ज्यादा कीमत चुकानी पड़ रही है।

कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल

आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, जो Financial Express और OilMonster की रिपोर्टों से जुटाए गए हैं, यह क्रूड बास्केट 14 सितंबर को 128.70 डॉलर पर था। यह दाम 2 सितंबर को दर्ज किए गए 99.35 डॉलर और 9 सितंबर के 115.98 डॉलर से काफी ऊपर तेजी से चढ़ा है। अगर इसकी तुलना 2 जुलाई 2026 के 67.16 डॉलर से की जाए, तो कीमतों में दोगुने से ज्यादा का इजाफा देखने को मिला है। जानकारों का कहना है कि भारत अब फ्यूचर स्क्रीन पर दिखने वाले कम दामों के बजाय फिजिकल बैरल की लैंडेड कीमत चुका रहा है, जिसमें फ्रेट, बीमा और क्वालिटी प्रीमियम शामिल होता है।

GulfHindi की हर खबर सबसे पहलेJoin

खुदरा पेट्रोल और डीजल के दाम स्थिर

दिल्ली में पेट्रोल और डीजल के खुदरा पंप दामों में अभी तक इस तेजी का असर नहीं दिखा है। पेट्रोलियम योजना और विश्लेषण प्रकोष्ठ यानी PPAC के 16 सितंबर के बोर्ड के अनुसार, दिल्ली में पेट्रोल 102.12 रुपये प्रति लीटर और डीजल 95.20 रुपये प्रति लीटर पर बिक रहा है। इन कीमतों को बनाए रखना एक राजनीतिक फैसला है, जिसके तहत सारा वित्तीय बोझ सरकारी तेल कंपनियों के बैलेंस शीट पर डाला जा रहा है। Financial Express की रिपोर्ट बताती है कि Indian Oil Corporation, BPCL और HPCL ने जून 2026 के अंत तक लगभग 61,900 करोड़ रुपये के घाटे यानी अंडर-रिकवरी को खुद झेला है।

सप्लाई चेन बाधित होने के मुख्य कारण

स्ट्रेट ऑफ होरमुज के पास फिर से शुरू हुई झड़पों के कारण तेल की कीमतों में यह भारी अस्थिरता आई है। ICRA के एनालिस्ट प्रशांत वशिष्ठ ने बताया कि सऊदी ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन के बंद होने से सप्लाई की दिक्कतें और बढ़ गई हैं, जबकि यह पाइपलाइन आम तौर पर वैश्विक लिक्विड मांग का चार से पांच प्रतिशत हिस्सा ले जाती है। ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों द्वारा सऊदी बुनियादी ढांचे पर किए गए हमले इस सप्लाई सुरक्षा संकट का मुख्य कारण बने हुए हैं। इसके अलावा शिपिंग की बढ़ती लागत ने स्थिति को और खराब कर दिया है। Kpler के आंकड़ों के अनुसार, भारत के लिए एफ्रामैक्स टैंकर की दरें लगातार सात हफ्तों तक बढ़ीं और 6 सितंबर को समाप्त हुए हफ्ते में यह 23.20 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गईं। NDTV Profit ने 16 सितंबर को बताया कि कुछ भारतीय रिफाइनर अब तुरंत मिलने वाले कार्गो के लिए 120 से 130 डॉलर तक चुका रहे हैं, जो छह हफ्ते पहले के स्तर से 35 से 40 प्रतिशत ज्यादा है।

रूस और इराक से तेल आयात की स्थिति

साल 2022 से तेल की कीमतों में शॉक एब्जॉर्बर का काम करने वाला रूसी तेल अब भारी छूट पर उपलब्ध नहीं है। ThePrint की रिपोर्ट के मुताबिक, सितंबर के पहले दो हफ्तों में रूस से आने वाला तेल औसतन 1.42 मिलियन बैरल प्रतिदिन रहा, जो अगस्त के 2.1 मिलियन बैरल प्रतिदिन के औसत से 30 प्रतिशत कम है। रूस से मिलने वाले इन कम तेलों की भरपाई के लिए इराक एक मुख्य विकल्प के रूप में उभरा है। सरकारी अधिकारियों ने ऊर्जा खरीद की रणनीतियों का बचाव जारी रखा है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने 15 सितंबर को स्पष्ट किया कि रूस के साथ ऊर्जा सहयोग द्विपक्षीय साझेदारी का एक अहम हिस्सा बना हुआ है। उन्होंने जोर देकर कहा कि भारत किसी भी बाहरी दबाव या अमेरिकी टैरिफ की परवाह किए बिना अपने राष्ट्रीय हित के आधार पर ऊर्जा की खरीद जारी रखेगा।

आर्थिक जोखिम और भविष्य की चिंताएं

जैसे-जैसे क्रूड की कीमतें ऊंचे स्तर पर बनी हुई हैं, देश के आर्थिक जोखिम भी बढ़ते जा रहे हैं। Financial Express द्वारा उद्धृत एक सेक्टर एनालिस्ट ने चेतावनी दी है कि कच्चे तेल में हर 10 डॉलर की वृद्धि चालू खाता घाटे को जीडीपी के 0.35 से 0.5 प्रतिशत तक बढ़ा सकती है। अगर कीमतें छह महीने तक लगातार 110 से 115 डॉलर के बीच बनी रहती हैं, तो इससे आर्थिक विकास की रफ्तार धीमी हो सकती है और महंगाई 5 प्रतिशत से ऊपर बनी रह सकती है। आने वाले समय में बाजार के जानकारों की नजर कई अहम बातों पर टिकी है, जैसे होरमुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले टैंकरों की संख्या और भारत तथा रूस के बीच तकनीकी वार्ताओं की प्रगति। अगर क्रूड बास्केट 130 डॉलर के आसपास बना रहता है, तो केंद्र सरकार को खुदरा ईंधन के दाम बढ़ाने या फिर जरूरी ईंधन और उर्वरक सब्सिडी के बढ़ते बोझ को संभालने के लिए अतिरिक्त बजट सहायता देने जैसे कठिन फैसले लेने पड़ सकते हैं।

Share:

Comments

Leave a comment