ईरान संघर्ष की मार: उपभोक्ताओं से पहले भारतीय उत्पादकों की बढ़ेगी मुश्किल, वर्ल्ड बैंक की चेतावनी

मध्य पूर्व में जारी ईरान संघर्ष का असर अब भारतीय अर्थव्यवस्था पर दिखने की संभावना है। वर्ल्ड बैंक की सीनियर इकोनॉमिस्ट रान ली ने चेतावनी दी है कि कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें सबसे पहले भारतीय उत्पादकों (Producers) की कमर तोड़ेंगी, क्योंकि इसका सीधा असर थोक महंगाई सूचकांक (WPI) पर पड़ता है। उनके अनुसार, तेल आयात और उसकी कीमतों में उछाल वह मुख्य रास्ता है जिसके जरिए यह वैश्विक तनाव भारत की आर्थिक स्थिति को प्रभावित करेगा।
रान ली ने बताया कि जून महीने से ही थोक महंगाई में बढ़ोतरी देखी गई है, जिसका सीधा प्रभाव औद्योगिक क्षेत्र के उत्पादकों पर पड़ रहा है। जब कंपनियों के लिए कच्चा माल और उत्पादन लागत बढ़ती है, तो वे इस बोझ को अंततः उपभोक्ताओं पर डाल देती हैं। इसका मतलब यह है कि शुरुआत में उत्पादक परेशान होंगे, लेकिन धीरे-धीरे यह महंगाई आम जनता की जेब तक पहुंचेगी, जिससे बाजार में खपत (Consumption) कम हो सकती है।
अर्थव्यवस्था के सामने दो बड़ी चुनौतियां
वर्ल्ड बैंक ने वित्तीय वर्ष 2027 के लिए भारत की आर्थिक विकास दर का अनुमान 7.1 प्रतिशत कर दिया है, लेकिन रान ली ने दो बड़े खतरों की ओर इशारा किया है। पहला है ईरान संघर्ष से पैदा होने वाला तेल संकट और दूसरा है 'एल नीनो' (El Nino) के कारण बारिश में आई कमी।
- कृषि पर असर: बारिश की कमी ऐतिहासिक औसत से करीब 12 से 15 प्रतिशत कम रही है, जिससे कृषि उत्पादन घटने की आशंका है। इसका सीधा असर ग्रामीण इलाकों की खपत पर पड़ेगा।
- महंगाई का दबाव: अगस्त के महंगाई आंकड़े पहले ही इस प्रभाव को दिखाना शुरू कर चुके हैं, और उम्मीद है कि वित्त वर्ष की दूसरी छमाही में यह दबाव और बढ़ेगा।
हालांकि, राहत की बात यह है कि भारत की घरेलू अर्थव्यवस्था उम्मीद से ज्यादा लचीली साबित हुई है। सरकार की समय पर ली गई प्रतिक्रियाओं और पिछले एक दशक में बनाए गए आर्थिक बफर ने देश को सहारा दिया है। रान ली के मुताबिक, टू-व्हीलर और फोर-व्हीलर की बिक्री के आंकड़े बताते हैं कि ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में खपत अभी भी स्थिर है। निवेश के संकेत भी सकारात्मक हैं, जो तेल की बढ़ती कीमतों के झटके को कुछ हद तक कम करने में मदद कर सकते हैं।