ईरान बोला: बातचीत को तैयार, पर हर हालात से निपटने की भी पूरी तैयारी

ईरान के डिप्टी एफएम काज्म गरीबबादी ने कहा कि वे राजनयिक समाधान चाहते हैं, लेकिन किसी भी हमले का करारा जवाब देने को तैयार हैं।

Gautam Sahu4 November 20262 min read0 viewsWorld
ईरान बोला: बातचीत को तैयार, पर हर हालात से निपटने की भी पूरी तैयारी

तेहरान: ईरान के डिप्टी विदेश मंत्री काज्म गरीबबादी ने स्पष्ट किया है कि अमेरिका और इजरायल के साथ चल रहे संघर्ष को खत्म करने के लिए तेहरान राजनयिक बातचीत के लिए प्रतिबद्ध है। 4 नवंबर, 2026 को दिए गए अपने बयान में उन्होंने कहा कि ईरान संवाद चाहता है, लेकिन साथ ही वह हर तरह की स्थिति से निपटने के लिए पूरी तरह तैयार है।

गरीबबादी ने जोर देकर कहा कि जब तक ईरान के खिलाफ सैन्य आक्रामकता पूरी तरह खत्म नहीं हो जाती, तब तक देश को वैध आत्मरक्षा का अधिकार है। फरवरी 2026 में अमेरिका और इजरायल द्वारा किए गए हमलों के बाद से तेहरान खुद को युद्ध की स्थिति में मान रहा है।

विवाद को सुलझाने के लिए ईरान कतर की मध्यस्थता से एक सात सूत्रीय प्रस्ताव का सहारा ले रहा है। इस प्रस्ताव में अमेरिका द्वारा लगाई गई नौसैनिक नाकाबंदी हटाने, ईरान की जमी हुई संपत्तियों को वापस करने और तेल बिक्री पर लगे प्रतिबंधों को हटाने जैसी मांगें शामिल हैं।

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ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची और सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल के सचिव मोहसिन रजाई ने इन मांगों पर अमेरिका की हालिया प्रतिक्रिया को "असंतोषजनक" बताया है। हालांकि, मध्यस्थों के जरिए दोनों पक्षों के बीच अप्रत्यक्ष बातचीत अभी भी जारी है।

यह कूटनीतिक कोशिशें ऐसे समय में हो रही हैं जब सैन्य तनाव बढ़ा हुआ है। पिछले 24 घंटों के भीतर अमेरिकी सेना ने केशम द्वीप पर स्थित ईरान के एयर-डिफेंस सिस्टम पर सीमित हमले किए हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस ऑपरेशन को एक "छोटा हमला" बताया है, जिसका लक्ष्य एक नई बनी फैसिलिटी थी।

अमेरिका में इस समय मध्यावधि चुनाव चल रहे हैं, जिसमें मौजूदा अनुमानों के मुताबिक डेमोक्रेटिक पार्टी को कांग्रेस में बड़ी बढ़त मिलने की संभावना है। दूसरी तरफ, ईरानी अधिकारियों ने चेतावनी दी है कि अगर आगे और हमले हुए, तो वे "अधिकतम निवारण" रणनीति अपनाएंगे और "करारा जवाब" देंगे।

वॉशिंगटन और तेहरान दोनों ही इस बात की तैयारी कर रहे हैं कि यदि राजनयिक रास्ते विफल रहे तो क्या होगा। इससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंता बढ़ गई है कि यह विवाद पूरे क्षेत्र में फैल सकता है, जिससे खाड़ी देशों के बुनियादी ढांचे को खतरा हो सकता है।

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