Iran US Tensions: ईरान ने अमेरिका को दी चेतावनी, कहा- जून समझौते का पालन करो वरना हालात होंगे खराब।

क्षेत्र में बढ़ते तनाव के बीच मंगलवार, 1 सितंबर 2026 को किर्गिस्तान के बिश्केक में शंघाई सहयोग संगठन (SCO) के शिखर सम्मेलन के दौरान ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन ने बड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा कि यदि अमेरिका जून में हस्ताक्षरित अंतरिम समझौते के तहत अपने वादों को पूरा करता है, तो ईरान तुरंत उसका जवाब देने के लिए तैयार है। ईरानी राष्ट्रपति ने स्पष्ट किया कि ईरान युद्ध नहीं चाहता है, लेकिन वह किसी भी आक्रामकता का करारा जवाब देगा और तनाव को खत्म करने के लिए बातचीत को सबसे अच्छा रास्ता मानता है।
सैन्य हमलों के बाद बढ़ी कूटनीतिक हलचल
यह कूटनीतिक अपील दोनों देशों के बीच हुई कई सैन्य झड़पों के बाद सामने आई है। घटनाक्रम के अनुसार, रविवार, 31 अगस्त 2026 को संयुक्त राज्य अमेरिका ने होर्मुज जलडमरूमध्य में स्थित लरक द्वीप पर हवाई हमले किए थे। इसके जवाब में ईरान ने सोमवार, 1 सितंबर 2026 को जॉर्डन और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) में तैनात अमेरिकी सैन्य बलों पर मिसाइल और ड्रोन से हमले किए। इन हमलों के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रोन ने ईरान को कड़ी चेतावनी देते हुए इस संघर्ष को एक छोटा युद्ध करार दिया। इसके अलावा, अमेरिकी ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेन्ट ने भी सोमवार को पुष्टि की कि अमेरिका तेहरान के खिलाफ अपनी आर्थिक दबाव की नीति को जारी रखेगा।
होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर ईरान की चेतावनी
ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अरागची ने भी अमेरिका से जून के समझौते के नियमों का पालन करने की अपील की और कहा कि ईरान अपने अधिकारों की रक्षा के लिए पूरी तरह तैयार है। ईरान के एक वरिष्ठ सूत्र ने हालिया हमलों को सीमित टकराव बताया है, लेकिन चेतावनी दी है कि यदि भविष्य में और हमले हुए तो इसका कड़ा जवाब दिया जाएगा। साथ ही, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यदि होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों के आने-जाने के नियमों का उल्लंघन हुआ, तो वहां गुजरने वाले जहाजों के लिए स्थिति और अधिक खराब हो सकती है।
आपको बता दें कि पाकिस्तान और कतर की मध्यस्थता से जून के महीने में एक अंतरिम समझौता हुआ था, जिसका उद्देश्य फरवरी के अंत से शुरू हुए संघर्षों को स्थायी रूप से रोकना और होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोलना था। हालांकि, ईरान का कहना है कि समझौते के लागू होने के दो सप्ताह के भीतर ही जब अमेरिका ने अपने वादों को पूरा नहीं किया, तो यह समझौता कमजोर पड़ गया और दोनों देशों के बीच फिर से तनाव बढ़ गया। इस पूरे घटनाक्रम का असर खाड़ी देशों में रह रहे लोगों और कामकाज पर भी पड़ रहा है।