इजरायल में 27 अक्टूबर को होने वाले चुनाव से लेबनान के प्रति नीति बदलने की उम्मीद कम जता रहे हैं विशेषज्ञ
लेबनान के विशेषज्ञों का मानना है कि 27 अक्टूबर को होने वाले इजरायल चुनाव से क्षेत्रीय नीति में कोई बड़ा बदलाव नहीं आएगा।

बेरुत: इजरायल में 27 अक्टूबर 2026 को होने वाले संसदीय चुनावों को लेकर लेबनान के निवासी और विश्लेषक संशय में हैं। उनका मानना है कि इन चुनावों के बाद लेबनान के प्रति इजरायल की नीति में कोई बड़ा बदलाव नहीं आएगा। वर्तमान स्थिति को न युद्ध और न ही शांति वाली एक लंबी खिंचती हुई स्थिति बताया जा रहा है।
हाल ही में अमेरिका की मध्यस्थता में फ्लोरिडा के टाम्पा में 20 और 21 अक्टूबर को इजरायली और लेबनानी सैन्य प्रतिनिधिमंडलों के बीच बातचीत हुई, लेकिन इसमें कोई सफलता नहीं मिली। लेबनान के अधिकारियों ने इजरायली हमलों को रोकने और लेबनानी क्षेत्र से पूरी तरह वापसी की मांग की है। उन्होंने सैन्य समन्वय के बजाय तीसरे पक्ष के सत्यापन तंत्र के इस्तेमाल पर जोर दिया है।
दूसरी ओर, प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने 20 अक्टूबर को कहा कि इजरायल चाहता है कि लेबनानी सशस्त्र बल कुछ खास पायलट जोन से हिजबुल्लाह के खतरों को खत्म करें। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर लेबनानी सेना ऐसा करने में नाकाम रही, तो इजरायल आगे हस्तक्षेप कर सकता है। इजरायली रक्षा मंत्री इजरायल काट्ज़ ने 21 अक्टूबर को पुष्टि की कि इजरायल ने दक्षिण लेबनान में करीब 700 वर्ग किलोमीटर इलाके पर कब्जा कर रखा है, जिसे सुरक्षा क्षेत्र कहा गया है। उन्होंने और अधिक जमीन कब्जाने की संभावना भी जताई।
लेबनान के राष्ट्रपति जोसेफ औन ने 22 अक्टूबर को चेतावनी दी कि विदेशी दूतों के अनुसार क्षेत्रीय घटनाक्रमों की वजह से लेबनान खुद को बड़ी घटनाओं के केंद्र में पा सकता है। इससे पहले 28 सितंबर को औन ने कहा था कि चुनाव इजरायल का आंतरिक मामला है, लेकिन सीमा स्थिरता को लेकर इजरायल के असली इरादों पर देश चिंतित है।
विश्लेषक जुमाना हद्दाद ने 23 अक्टूबर को कहा कि नेतन्याहू और हिजबुल्लाह एक-दूसरे के लिए उपयोगी दुश्मन की तरह काम कर रहे हैं, जिससे उनके अपने नैरेटिव बने रहते हैं। वहीं, अमेरिकन मिडईस्ट गठबंधन फॉर डेमोक्रेसी के अध्यक्ष जॉन हज्जार ने दावा किया कि लेबनानी जनता इजरायल के साथ पूर्ण राजनयिक संबंध चाहती है, लेकिन हिजबुल्लाह और असहयोगी सरकार इसमें बाधा बन रहे हैं।
एमनेस्टी इंटरनेशनल ने 23 और 24 अक्टूबर को जारी बयानों में कहा कि मतदान के बाद फिलिस्तीनियों, लेबनानी और सीरियाई लोगों के मानवाधिकारों के मानकों में बहुत कम बदलाव की उम्मीद है। संस्था ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से नई सरकार पर दक्षिण लेबनान के कब्जे और मानवाधिकार उल्लंघनों को दूर करने के लिए दबाव डालने की अपील की है।
क्षेत्रीय विशेषज्ञों का कहना है कि चाहे नेतन्याहू जीतें या उनके मुख्य प्रतिद्वंद्वी पूर्व आईडीएफ चीफ ऑफ स्टाफ गादी आइजनकोट, इजरायल का बुनियादी सुरक्षा सिद्धांत नहीं बदलेगा। इस सिद्धांत में ईरान को रोकना, बफर जोन बनाए रखना और हिजबुल्लाह का निशस्त्रीकरण शामिल है। राजनीतिक जानकारों ने यह भी आशंका जताई है कि नई सरकार बनाने में देरी से क्षेत्रीय कूटनीति और धीमी हो सकती है।
इजरायली सीमावर्ती शहर किर्यात शमोना की रिपोर्टों के मुताबिक, नेतन्याहू के प्रति समर्थन कम हो रहा है। इसकी वजह 2023 से जारी संघर्ष का प्रबंधन है, जिसमें हजारों लोग विस्थापित हुए और लेबनान में भारी संख्या में लोग मारे गए। मतदान से पहले यह भी देखा गया है कि 7 अक्टूबर 2023 की घटनाओं को लेकर यहूदी और अरब मतदाताओं के नजरिए में बड़ा अंतर है।