इजराइल प्रोडक्ट सेंटर ने डच सरकार के खिलाफ किया मुकदमा, सेटलमेंट सामानों के बैन पर मचा विवाद.

ईसाई संगठन Christians for Israel (CvI) के तहत आने वाले इजराइल प्रोडक्ट सेंटर ने डच सरकार के खिलाफ कानूनी लड़ाई शुरू कर दी है। सेंटर ने वेस्ट बैंक के अवैध बस्तियों से आने वाले सामानों पर लगाए गए सरकारी बैन को लेकर कोर्ट में चुनौती दी है और इस नीति को भेदभावपूर्ण बताया है। इस मामले की सुनवाई 27 अगस्त 2026 को हुई थी और अदालत का फैसला लगभग दो सप्ताह के भीतर आने की उम्मीद है।
डच सरकार का नया नियम और अंतरराष्ट्रीय अदालत का फैसला
डच प्रधानमंत्री Rob Jetten की अगुवाई वाली सरकार का कहना है कि यह बैन बहुत जरूरी है ताकि नीदरलैंड फिलिस्तीनी क्षेत्रों के अवैध कब्जे में किसी भी तरह का योगदान न दे। यह बैन 22 सितंबर 2026 से तीन साल के लिए लागू होने वाला है। इस नए उपाय के तहत इजरायली बस्तियों यानी वेस्ट बैंक, पूर्वी यरुशलम और सीरियाई गोलान हाइट्स से आने वाले सामानों की खरीद-बिक्री और आयात पर पूरी रोक लगाई गई है। इसके अलावा ऐसा व्यापार करने में मदद करने वाली सेवाओं पर भी पाबंदी रहेगी। इस नियम का उल्लंघन करने वालों को छह साल तक की जेल की सजा मिल सकती है। सरकार का यह कदम जुलाई 2024 के इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस यानी ICJ की उस सलाह के बाद उठाया गया है जिसमें इजराइल के कब्जे को अवैध घोषित किया गया था।
इजराइल की तरफ से कड़ी प्रतिक्रिया
इस बैन के जवाब में इजराइल ने भी सख्त कदम उठाया है। इजराइल के विदेश मंत्री Gideon Sa'ar ने 26 अगस्त 2026 को किरयात गाट स्थित सिविल-मिलिट्री कोऑर्डिनेशन सेंटर में तैनात दो डच नागरिकों को देश से बाहर निकालने का आदेश दिया। प्रधानमंत्री Benjamin Netanyahu से सलाह के बाद यह फैसला लिया गया। डच विदेश मंत्री Tom Berendsen ने इस निष्कासन को एक गैर-जरूरी कदम बताया है लेकिन साथ ही अपनी सरकार के ट्रेड बैन के फैसले पर कायम रहने की बात भी कही है।
नीदरलैंड्स में घरेलू विरोध और कानूनी पक्ष
नीदरलैंड्स के भीतर भी इस नीति को लेकर राजनीति गरमाई हुई है और राजनेता Geert Wilders ने सरकार के इस कदम को धोखा करार दिया है। दूसरी तरफ लीडेन यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर Larissa van den Herik ने बताया है कि सरकार का यह कदम अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून के गंभीर उल्लंघनों को रोकने के कानूनी दायित्वों के तहत ही उठाया गया है। ग्लोबल इको संगठन के आंकड़ों के मुताबिक नीदरलैंड्स ने ऐतिहासिक रूप से यूरोपीय संघ को इन बस्तियों से होने वाले कृषि निर्यात में एक बड़ा हिस्सा निभाया है।