West Bank News: इसराइली सेना ने कुसरे गांव में लगाए मेटल गेट, घरों को बनाया मिलिट्री पोस्ट

कब्जे वाले वेस्ट बैंक के कुसरे गांव में हालात लगातार तनावपूर्ण बने हुए हैं, जहां इसराइली सेना ने फलस्तीनी घरों के पास तीन मेटल गेट लगा दिए हैं। 27 अगस्त 2026 तक मिली जानकारी के मुताबिक, इस कदम से स्थानीय लोगों में इस बात का बड़ा डर बैठ गया है कि सेना यहां हमेशा के लिए अपनी मौजूदगी चाहती है और जमीन पर आने-जाने के रास्तों को पूरी तरह बंद करना चाहती है। यह कार्रवाई करीब 18 दिनों तक चले उस घेराव के बाद की गई है जो सेटलर्स यानी यहूदी बस्तियों के लोगों ने 9 अगस्त 2026 के आसपास शुरू किया था।
रास्तों पर पहरा और घरों पर कब्जा
रिपोर्ट्स के मुताबिक 26 अगस्त 2026 को यह पुष्टि की गई थी कि नाब्लस के दक्षिण में स्थित रास अल-ऐन इलाके में तीन घिरे हुए घरों के इकलौते आने-जाने वाले रास्ते पर एक बड़ा गेट खड़ा कर दिया गया है। कुसरे के मेयर अब्दुल अजीम वादी ने मीडिया को बताया कि सेना ने इस इलाके के 16 फलस्तीनी घरों पर जबरन कब्जा कर लिया है और उन्हें फौजी चौकियों में बदल दिया है। इन घरों में रहने वाले आम नागरिक, जिनमें फलस्तीनी-अमेरिकी लौ रिडी और आयशा अबू रिदा भी शामिल हैं, अपने ही घरों के अंदर कैद होकर रह गए हैं। उनके पास खाने-पीने का सामान और जरूरी दवाइयां भी बहुत कम मात्रा में बची हैं। इसराइली सेना ने इस पूरे इलाके को बंद सैन्य क्षेत्र घोषित कर दिया है, जिसकी वजह से वहां के स्थानीय लोगों के अलावा मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और पत्रकारों का आना-जाना भी पूरी तरह रोक दिया गया है। इस मामले पर Qatar News Agency (QNA) की रिपोर्ट में पूरी स्थिति का विस्तार से जिक्र किया गया है। दूसरी तरफ इसराइली सेना यानी Israel Defense Forces का कहना है कि सैनिकों को वहां अवैध रूप से घेरा डालने वाले सेटलर्स को हटाने और गैरकानूनी ढांचों को गिराने के लिए भेजा गया था, लेकिन इसके बावजूद फौजी बल पूरे इलाके में डटे हुए हैं।
मानवाधिकार संगठनों की कड़ी निंदा
इस पूरी घटना और सैन्य कार्रवाई के खिलाफ दुनिया भर के संगठनों ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्च कमिश्नर कार्यालय और फलस्तीनी विदेश मंत्रालय ने इस घेराबंदी की कड़ी आलोचना की है। एमनेस्टी इंटरनेशनल ने इस नाकेबंदी को इस्राइल सरकार द्वारा समर्थित एक सोची-समझी दहशतगर्दी करार दिया है। इसके अलावा फलस्तीनी नेशनल इनिशिएटिव के महासचिव मुस्तफा बारघौूती ने इसे सुनियोजित तरीके से लोगों को उनकी जमीन से बेदखल करने वाला कदम बताया है। इसराइली एनजीओ केरेम नाइवोट से जुड़े ड्रोर एटकेस ने भी इसे जमीन पर कब्जा जमाने की एक सोची-समझी सैन्य नीति का हिस्सा माना है। इन सब के बीच, 26 अगस्त 2026 को अमेरिका में बैठे मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और संगठनों ने वहां की संसद यानी कांग्रेस से औपचारिक अपील की है कि वे इस मामले में दखल दें और इस गांव में चल रहे मानवीय संकट के लिए इस्राइल को जिम्मेदार ठहराएं।