लाहौर पुलिस की जांच प्रक्रिया भ्रष्टाचार के आरोपों के बीच धीमी

पाकिस्तान के लाहौर में पुलिस विभाग इन दिनों गंभीर संकट के दौर से गुजर रहा है। एंटी-करप्शन एस्टेब्लिशमेंट (ACE) की तरफ से की गई लगातार छापेमारी और कई अधिकारियों की गिरफ्तारी के बाद पुलिस की जांच प्रणाली की गति काफी धीमी पड़ गई है। एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी के हवाले से सामने आई रिपोर्ट में यह बात सामने आई है कि जांच अधिकारियों को फील्ड में काम करने के दौरान कई तरह की आर्थिक परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है, जिसमें मुख्य रूप से ईंधन और अन्य जरूरी ऑपरेशनल खर्च शामिल हैं।
फंड की भारी कमी के कारण स्थिति यह हो गई है कि मामलों की जांच से जुड़े खर्चों को पूरा करने के लिए कभी-कभी शिकायतकर्ताओं और आरोपियों पर ही आर्थिक बोझ डालने की बात सामने आ रही है। इस साल जनवरी से लेकर अब तक लाहौर के 84 थानों में लगभग 165,000 मामले दर्ज किए जा चुके हैं, जिनमें से एक बड़ा हिस्सा अभी भी अपनी जांच का इंतजार कर रहा है। शहर में हर साल औसतन 280,000 मामले दर्ज किए जाते हैं, जिन्हें संभालना पुलिस के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है।
रिपोर्ट के अनुसार, पंजाब सरकार ने लाहौर में जांच संबंधी खर्चों के लिए केवल 40 मिलियन रुपये आवंटित किए हैं, जबकि पुलिस अधिकारियों का अनुमान है कि सुचारू रूप से काम चलाने के लिए सालाना लगभग 1 अरब रुपये की आवश्यकता है। वित्तीय संकट का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इससे पहले भी साल 2022 में तत्कालीन डीआईजी इन्वेस्टिगेशन ने 867 मिलियन रुपये की मांग की थी, जिसके मुकाबले महज 56 मिलियन रुपये ही मंजूर किए गए थे।
इसके अलावा, संवेदनशील और हाई-प्रोफाइल मामलों के खर्चों को संभालना भी पुलिस के लिए सिरदर्द साबित हो रहा है। ऐसे मामलों में राजनीतिक दलों के नेताओं से जुड़े प्रकरण भी शामिल हैं। रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया है कि पुलिस रिपोर्ट में आपत्तियों को दूर करने के लिए अभियोजन अधिकारियों द्वारा पैसे की मांग की जाती है, जिससे स्थिति और भी जटिल हो गई है।
डीआईजी इन्वेस्टिगेशन जीशान रजा ने स्वीकार किया है कि जांच विंग गंभीर वित्तीय मुश्किलों से जूझ रही है। उन्होंने बताया कि विभाग ने पुलिस महानिरीक्षक के माध्यम से पंजाब सरकार को पत्र लिखकर जांच के लिए फंड बढ़ाने का अनुरोध किया है, ताकि इस संकट से जल्द से जल्द निपटा जा सके।