मलेशिया ने शुरू किया म्यांमार नागरिकों का विवादित निर्वासन, यूएन और मानवाधिकार समूहों की बढ़ी चिंता

मलेशिया सरकार ने म्यांमार के नागरिकों को वापस भेजने के एक विवादित कार्यक्रम की शुरुआत कर दी है, जिसके तहत हाल ही में 1,476 लोगों को उनके गृह देश वापस भेज दिया गया है। इस कदम ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बड़ी हलचल पैदा कर दी है और संयुक्त राष्ट्र (UN) सहित कई मानवाधिकार संगठनों ने इस पर गहरी नाराजगी और चिंता व्यक्त की है।
मलेशियाई गृह मंत्रालय के अनुसार, इस पहले जत्थे में 1,370 पुरुष, 79 महिलाएं, 20 लड़के और 7 लड़कियां शामिल थीं, जिनकी उम्र आठ से साठ साल के बीच है। इन सभी को Perak राज्य के एक बंदरगाह पर बसों से लाया गया और फिर म्यांमार नौसेना के तीन जहाजों पर सवार कर रवाना किया गया। सरकार का दावा है कि ये सभी नागरिक स्वेच्छा से अपने देश लौट रहे हैं।
हालांकि, मलेशियन सरकार के इस 'स्वैच्छिक वापसी' वाले दावे पर यूएन शरणार्थी एजेंसी (UNHCR) और नागरिक समाज संगठनों ने गंभीर सवाल खड़े किए हैं। UNHCR की प्रोटेक्शन मामलों की अधिकारी एडेम वोसोरनु ने बताया कि हिरासत केंद्रों में बंद इन लोगों तक स्वतंत्र पहुंच नहीं दी गई, जिससे यह सत्यापित करना असंभव था कि उनकी वापसी वास्तव में स्वैच्छिक थी या नहीं।
अंतरराष्ट्रीय संगठनों की कड़ी चेतावनी
इस पूरी प्रक्रिया के खिलाफ मानवाधिकार संगठन खुलकर सामने आ गए हैं। संयुक्त राष्ट्र के विशेष रैपोर्टेयर ने मलेशिया से इस निर्वासन प्रक्रिया को तुरंत रोकने का औपचारिक आग्रह किया है। उनका मानना है कि संघर्ष से घिरे म्यांमार, विशेषकर रखाइन राज्य में लौटने वाले इन नागरिकों को उत्पीड़न, क्रूरता और गंभीर मानवाधिकार उल्लंघनों का वास्तविक जोखिम है।
मलेशिया के प्रधानमंत्री अनवर इब्राहिम ने इस नीति का बचाव करते हुए कहा है कि देश अनिश्चित काल तक शरणार्थियों का बोझ नहीं उठा सकता और म्यांमार की सैन्य-नेतृत्व वाली सरकार को अपने नागरिकों की जिम्मेदारी खुद उठानी होगी। आपको बता दें कि मलेशिया घरेलू कानून के तहत शरणार्थियों को औपचारिक मान्यता नहीं देता, बल्कि उन्हें बिना दस्तावेजों वाले प्रवासियों के रूप में देखता है।
आगे क्या है योजना?
मलेशिया सरकार की इस योजना के तहत कुल 5,000 म्यांमार नागरिकों को वापस भेजने की तैयारी है। इस बीच, 160 से अधिक नागरिक समाज संगठनों ने प्रधानमंत्री इब्राहिम को पत्र लिखकर इस निर्वासन को रोकने की अपील की है। एमनेस्टी इंटरनेशनल मलेशिया और ह्यूमन राइट्स वॉच जैसे संगठनों ने इसे शरणार्थी सुरक्षा का गंभीर उल्लंघन और 'नॉन-रेफौलेमेंट' (non-refoulement) के अंतरराष्ट्रीय सिद्धांत के खिलाफ बताया है, जो किसी व्यक्ति को ऐसे स्थान पर लौटने के लिए मजबूर करने से रोकता है जहाँ उसकी जान या स्वतंत्रता को खतरा हो।
विशेषज्ञों और कार्यकर्ताओं का मानना है कि म्यांमार में व्यापक तबाही और हिंसा के माहौल को देखते हुए वहां सुरक्षित वापसी फिलहाल संभव नहीं है, और इस प्रकार की कार्रवाइयां हजारों बेसहारा लोगों की जिंदगी को बड़े खतरे में डाल सकती हैं।