हिजबुल्लाह के भारी मात्रा में विस्फोटक जब्त होने के बाद अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने लेबनान से जवाब मांगा

बेरुत: अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने लेबनान के राष्ट्रपति जोसेफ औन से फोन पर बात कर हिजबुल्लाह के जब्त किए गए विस्फोटकों के मामले में जवाबदेही तय करने की मांग की है। यह बातचीत गुरुवार, 15 अक्टूबर 2026 को हुई, जिसमें रुबियो ने साफ किया कि जब्त किए गए सामान को हिजबुल्लाह को वापस करना मुमकिन नहीं है।
रुबियो ने मांग की है कि इस खेप को मंगवाने, इसके लिए पैसा देने और निर्देश देने वाले लोगों को जिम्मेदार ठहराया जाए। उन्होंने लेबनान और इजरायली सेनाओं के बीच सीधे सैन्य संवाद की वकालत की ताकि गलतफहमी के कारण टकराव का खतरा कम हो सके। साथ ही उन्होंने लेबनान के 1955 के बहिष्कार कानून की आलोचना करते हुए कहा कि यह शांति प्रयासों में बाधा डाल रहा है।
पिछले हफ्ते लेबनानी अधिकारियों ने भारी मात्रा में गोला-बारूद जब्त किया था। हिजबुल्लाह सांसद हसन फदलाला ने सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया कि जब्त ट्रक उनका था। इस ट्रक में कुल 780 किलोग्राम विस्फोटक थे, जिसमें 250 किलो टीएनटी और 250 किलो सी-4 शामिल थे।
फदलाला ने दावा किया कि इन विस्फोटकों का इस्तेमाल केवल दक्षिण लेबनान में इजरायली सेना के खिलाफ किया जाना था। उन्होंने इस खेप को वापस करने और गिरफ्तार किए गए दो लोगों को रिहा करने की मांग की। उन्होंने लेबनान सरकार के उस फैसले को भी खारिज कर दिया, जिसमें 2 मार्च 2026 को हिजबुल्लाह की सैन्य गतिविधियों पर रोक लगाई गई थी।
दूसरी तरफ, राष्ट्रपति जोसेफ औन ने मार्को रुबियो को भरोसा दिलाया कि लेबनानी सेना और सुरक्षा बल तस्करी रोकने और हथियारों के प्रदर्शन को रोकने के लिए अपनी ड्यूटी कर रहे हैं। औन ने कहा कि न्यायपालिका मामलों की जांच कर रही है और कानून बिना किसी भेदभाव के लागू होगा।
राष्ट्रपति औन ने अमेरिका से यह अनुरोध भी किया कि वह इजरायल पर दक्षिण लेबनान के शहरों में हमले रोकने के लिए दबाव डाले। उन्होंने अमेरिका द्वारा तय किए गए उस समझौते का पालन करने की बात कही, जिसमें हिजबुल्लाह के निशस्त्रीकरण के बदले इजरायली सैनिकों की वापसी का प्रावधान है।
प्रधानमंत्री नवाफ सलाम ने जब्त किए गए विस्फोटकों पर चिंता जताई है। उन्होंने बताया कि सी-4 विस्फोटकों का संबंध देश में पहले हुई राजनीतिक हत्याओं से रहा है। इस पूरी घटना के बाद लेबनान के भीतर सैन्य संपत्तियों पर सरकारी नियंत्रण को लेकर राजनीतिक तनाव काफी बढ़ गया है।