अरब में प्रवासी जिन पेड़ों से पैसे तोड़कर लाते हैं, आज वो पेड़ मिल गया

ऊपर आसमान छूती इस लोहे-बांस की जाली में, हर एक इंसान एक "पेड़" पर चढ़ा है — पर यह कोई फलदार पेड़ नहीं, यह है जिंदगी और मौत के बीच बंधी एक पतली रस्सी।
100 फीट ऊंचाई पर, बिना ठीक से बंधे सेफ्टी बेल्ट के, हेलमेट पहने हुए ये चेहरे — किसी के पिता हैं, किसी के भाई, किसी के बेटे। घर पर बूढ़ी मां रोज़ सुबह चौखट पर बैठकर पोस्टमैन का इंतज़ार करती है। पत्नी बच्चों की स्कूल फीस के लिए किसी और से उधार मांगती है, यह सोचकर कि "अगले महीने पापा पैसे भेजेंगे।"
और वो "पापा" — वहां, उस लोहे की जाली में, आसमान के इतने करीब कि बादल छू सकें, पर ज़मीन इतनी दूर कि एक गलती, एक फिसलन... और सब कुछ खत्म।

हम जब भी विदेश से आया पैसा देखते हैं, हमें सिर्फ नोट दिखते हैं।
कोई नहीं देखता कि उस नोट के पीछे कितनी बार दिल धड़का, कितनी बार पैर कांपे, कितनी बार आंखों के सामने अंधेरा छाया और फिर भी हाथ मज़बूती से पकड़े रहे उस लोहे के डंडे को — क्योंकि नीचे इंतज़ार कर रहा है पूरा एक परिवार।
यह तस्वीर सिर्फ एक निर्माण स्थल की नहीं है।
यह तस्वीर है हर उस भारतीय, पाकिस्तानी, बांग्लादेशी और नेपाली मज़दूर की, जो अपने वतन की मिट्टी छोड़कर रेगिस्तान की गर्मी में, ऊंचाई के खतरे में, अकेलेपन के अंधेरे में — सिर्फ इसलिए खड़ा है ताकि उसके घर का चूल्हा जलता रहे।
कोई मशीन नहीं उठाती यह जोखिम — इंसान उठाता है।
और वो इंसान, जब हर महीने अपनी सैलरी से थोड़े पैसे बचाकर घर भेजता है, तो उसे लगता है जैसे उसने किसी पेड़ से फल तोड़कर भेजे हों — मीठे, मेहनत के फल।
पर असल में... वो फल नहीं, वो उसकी जान का हिस्सा है।
🤲 अगली बार जब कोई प्रवासी मज़दूर आपको दिखे — उसे सिर्फ "मज़दूर" मत समझिए। वो एक योद्धा है, जो हर रोज़ अपनी जान दांव पर लगाकर, अपने परिवार के लिए जंग लड़ रहा है।