खाड़ी देशों में रहने वाले लाखों बुजुर्ग भारतीयों के सामने पेंशन और इलाज का बड़ा संकट

खाड़ी देशों में दशकों से पसीना बहाने वाले हमारे देश के लाखों लोग अब जब बुढ़ापे की दहलीज़ पर पहुंच रहे हैं, तो उनके सामने एक बहुत बड़ी मुसीबत खड़ी हो गई है। यूएई, सऊदी अरब, कतर, ओमान, बहरीन और यमन जैसे देशों में रहने वाले करीब 1 करोड़ भारतीय बिना किसी पक्की पेंशन सुरक्षा और सस्ते इलाज के रिटायर होने को मजबूर हैं। यूनिवर्सिटी ऑफ एडिनबर्ग की डॉ. इदिल अकिंसी के एक हालिया शोध पत्र में इस बात का खुलासा हुआ है, जिसकी जानकारी डेक्कन हेराल्ड ने 20 सितंबर 2026 को प्रमुखता से सामने रखी है। इस रिपोर्ट से साफ पता चलता है कि वहां की लेबर व्यवस्था शुरू में कम समय के लिए आने वाले कामगारों को ध्यान में रखकर बनाई गई थी, लेकिन हकीकत यह है कि लाखों लोग वहां लंबे समय से बस गए हैं और अब उम्र ढलने के बाद उन्हें भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।
सरकारी आंकड़े क्या कहते हैं और भारतीय कहां कितनी संख्या में हैं
विदेश मंत्रालय के मार्च 2026 तक के आंकड़ों के मुताबिक, इन छह खाड़ी देशों में कुल मिलाकर लगभग 99.5 लाख भारतीय रहते हैं। अकेले यूएई में 43.26 लाख, सऊदी अरब में 27.48 लाख, कतर में 8.3 लाख, ओमान में 6.7 लाख और बहरीन में 3.2 लाख भारतीय नागरिक रोजगार या अन्य कारणों से रह रहे हैं। इसके अलावा यमन में भी कुछ संख्या में भारतीय मौजूद हैं जो काफी जोखिम भरे हालात का सामना कर रहे हैं। टाइम्स ऑफ इंडिया द्वारा संयुक्त राष्ट्र और अवर वर्ल्ड इन डेटा के हवाले से दी गई जानकारी के अनुसार, पूरी दुनिया में भारत के बाहर सबसे ज्यादा भारत में जन्मे प्रवासी यूएई में रहते जिनकी संख्या 32 लाख है, जबकि सऊदी अरब इस मामले में तीसरे स्थान पर है जहां 20 लाख लोग रहते हैं।
पेंशन और ग्रेच्युटी के नाम पर केवल मिलता है एकमुश्त पैसा
भारत में सरकारी नौकरी या अन्य जगहों पर मिलने वाली पेंशन जैसी कोई स्थायी व्यवस्था खाड़ी देशों में काम करने वाले लोगों के लिए नहीं है। वहां के नियम के हिसाब से कर्मचारियों को नौकरी छोड़ने या रिटायर होने पर केवल 'एंड-ऑफ-सर्विस इंडिमनिटी' यानी आखिरी सैलरी के आधार पर मिलने वाला एकमुश्त पैसा मिलता है। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन यानी ILO से जुड़ी रिपोर्ट्स के अनुसार यह रकम रिटायरमेंट से ठीक पहले मिलने वाली कमाई का केवल 10 से 13 प्रतिशत ही होती है। अंतरराष्ट्रीय सामाजिक सुरक्षा मानकों के मुताबिक यह आंकड़ा कम से कम 40 प्रतिशत होना चाहिए, जिससे साफ है कि यह राशि बुढ़ापे की जरूरतें पूरी करने के लिए काफी कम है। इसके अलावा भारत का कर्मचारी भविष्य निधि संगठन यानी EPFO इन देशों में काम करने वाले लोगों को कवर नहीं करता है और दोनों देशों के बीच ऐसा कोई समझौता भी नहीं है जिससे मिलने वाले पैसे को सीधे नेशनल पेंशन सिस्टम में ट्रांसफर किया जा सके।
महंगा इलाज और वीजा बचाने के लिए 60 की उम्र के बाद भी मजबूरी में नौकरी
पेंशन और ग्रेच्युटी का पैसा पर्याप्त न होने के कारण बहुत से बुजुर्ग भारतीय कामगार 60 साल की उम्र पार करने के बाद भी काम करने के लिए मजबूर हैं। उन्हें ऐसा इसलिए करना पड़ता है ताकि वे वहां अपनी कानूनी रेजिडेंसी यानी रहने का अधिकार और हेल्थ इंश्योरेंस बचा सकें। निजीMEDICAL का खर्च इतना ज्यादा होता है कि आम आदमी के लिए उसे उठा पाना मुमकिन नहीं होता है। हालांकि यूएई सरकार ने स्वैच्छिक बचत योजना जैसी कुछ नई कोशिशें शुरू की हैं और ओमान तथा बहरीन में भी भविष्य निधि मॉडल की तरफ बदलाव देखा जा रहा है, लेकिन इसके बावजूद आम परिवारों के लिए रहना, मकान का किराया चुकाना और जिंदगी बसर करना बहुत कठिन हो गया है। ILO की STREAM प्रोग्राम टीम साल 2024 से 2028 के दौरान भारत, बांग्लादेश, नेपाल, श्रीलंका और इन छह खाड़ी देशों के बीच सामाजिक सुरक्षा के फायदों को एक जगह से दूसरी जगह ट्रांसफर करने की दिशा में काम कर रही है, लेकिन जमीनी स्तर पर अभी तक कोई ठोस कानून लागू नहीं हो पाया है। इन तमाम बदलावों और राष्ट्रीयकरण के नियमों के बीच खाड़ी देशों से आने वाला पैसा भारत की कुल कमाई का आधा हिस्सा है, लेकिन वहां पसीना बहाने वाले प्रवासियों का बुढ़ापा आज भी असुरक्षित बना हुआ है।