सऊदी पर हूती हमलों के बाद मक्का पैक्ट पर उठे सवाल, एमजे अकबर ने दी ब्रिक्स डिक्लेरेशन देखने की सलाह

पूर्व विदेश राज्य मंत्री एम.जे. अकबर ने 13 सितंबर 2026 को मक्का डिफेंस पैक्ट की कार्यक्षमता पर सार्वजनिक रूप से सवाल खड़े किए हैं। यह बयान ऐसे समय में सामने आया है जब रिपोर्ट्स के मुताबिक सऊदी अरब ने हूती हमलों के बाद अमेरिकी सैन्य हस्तक्षेप की मांग की थी। अकबर ने इस दौरान समझौते पर हस्ताक्षर करने वाले देशों पाकिस्तान और तुर्किए की कथित निष्क्रियता पर रोशनी डाली और संकेत दिया कि पाकिस्तानी सेना ने अपनी सुरक्षा प्रतिबद्धताओं से कदम पीछे खींच लिए हैं। इस संबंध में अधिक जानकारी आप ANI News की रिपोर्ट में देख सकते हैं।
मक्का डिफेंस पैक्ट और उसकी स्थिति
मक्का ज्वाइंट डिफेंस एग्रीमेंट पर 7 अगस्त 2026 को हस्ताक्षर किए गए थे। यह समझौता नाटो के अनुच्छेद 5 की तरह काम करता है, जिसके तहत किसी भी एक सदस्य देश पर हुआ सशस्त्र हमला सभी सदस्यों पर हमला माना जाता है। इस समझौते की शर्तों के अनुसार, सऊदी अरब वित्तीय सहायता प्रदान करता है, तुर्किए रक्षा तकनीक उपलब्ध कराता है और पाकिस्तान सैन्य जनशक्ति का योगदान देता है। इसके अलावा रक्षा से जुड़ी अन्य जानकारी ANI News Defence Topic पर उपलब्ध है।
हालांकि, इस समझौते के बावजूद इसकी प्रभावशीलता पर संदेह बना हुआ है। यह संदेह 8 से 10 सितंबर 2026 के बीच सऊदी अरब पर हुए हूती हमलों के बाद और गहरा गया है। इन हमलों में देश के आर्थिक बुनियादी ढांचे को निशाना बनाया गया था, जिसमें कई लोग घायल हो गए थे।
पाकिस्तान और अमेरिका का रुख
घटनाक्रम के बीच 10 सितंबर 2026 को पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता सज्जाद हैदर खान ने स्पष्ट किया कि सामूहिक सैन्य प्रतिक्रिया पर फिलहाल कोई चर्चा नहीं चल रही है। हालांकि, इससे पहले पाकिस्तानी रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने कहा था कि यदि किंगडम को किसी भी प्रकार की अवांछित आक्रामकता का सामना करना पड़ता है, तो यह समझौता सक्रिय हो सकता है।
मीडिया रिपोर्ट्स से यह भी पता चलता है कि सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प को फोन करके सशस्त्र सहायता का अनुरोध किया था। हालांकि, खबरों के अनुसार राष्ट्रपति ट्रम्प ने इस अनुरोध को अस्वीकार कर दिया। अगस्त के महीने में जहां राष्ट्रपति ट्रम्प ने मक्का पैक्ट की एक बड़े सुरक्षा कदम के रूप में प्रशंसा की थी, वहीं क्रेमलिन के प्रेस सचिव दमित्री पेस्कोव ने बाद में इसे एक ऐसा विकासशील ढांचा बताया है जिसके लिए सावधानी बरतने की आवश्यकता है।
इन तमाम घटनाओं के बीच एम.जे. अकबर ने विशेष रूप से रियाद से आग्रह किया है कि वह ब्रिक्स दिल्ली घोषणापत्र की समीक्षा करे। भारत की अध्यक्षता में इस घोषणापत्र में कूटनीतिक और राजनीतिक संवाद के माध्यम से क्षेत्रीय शांति को प्राथमिकता दी जाती है, ताकि मध्य पूर्व के देशों में सुरक्षा और स्थिरता को बढ़ावा मिल सके।