हिमालयी क्षेत्र में एकतरफा विकास से बढ़ रही अस्थिरता और नेपाल जैसी आपदाएं ला रहा है नुकसान, बोले मोहन भागवत

नागपुर (महाराष्ट्र): राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत ने हिमालयी क्षेत्र में हो रहे एकतरफा विकास पर चिंता जताई है। उन्होंने कहा कि इस तरह का विकास प्रकृति में अस्थिरता पैदा कर रहा है, जिसकी वजह से नेपाल जैसी भीषण आपदाएं आ रही हैं।
महाराष्ट्र के नागपुर में रेशिमबाग मैदान पर आयोजित संघ के शताब्दी विजयदशमी उत्सव को संबोधित करते हुए भागवत ने संतुलित विकास की वकालत की। उन्होंने कहा कि भारत, तिब्बत, भूटान और चीन जैसे देशों में हिमालयी क्षेत्र के जरिए होने वाले एकतरफा विकास कार्यों ने प्रकृति का संतुलन बिगाड़ दिया है।
नेपाल में 26 अगस्त को आए 'हिमालयी सुनामी' का जिक्र करते हुए उन्होंने बताया कि चट्टान और बर्फ के खिसकने से आई इस आपदा में 1,400 से ज्यादा लोग मारे गए और 6,000 से अधिक लोग अब भी लापता हैं। इस तबाही से 70,000 से ज्यादा लोग सीधे तौर पर प्रभावित हुए हैं और बेघर हो गए हैं।
भागवत ने कहा कि तकनीक और विज्ञान ने तरक्की की है, लेकिन जब इतने बड़े पैमाने पर जान जाती है, तो दुख होता है। उन्होंने मृत लोगों को श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि राहत कार्य जरूरी हैं, लेकिन असली समाधान विकास के एक व्यापक और संतुलित नजरिए को अपनाने में है।
उन्होंने जोर दिया कि विकास ऐसा होना चाहिए जो टिकाऊ हो और जिसमें पारिस्थितिक स्थिरता और मानव कल्याण का ध्यान रखा जाए। उनके मुताबिक, विकास इतना महंगा नहीं होना चाहिए कि उसे लागू करने वाले लोग ही उसमें जीवित न बच सकें।
भारत के सनातन दृष्टिकोण पर बात करते हुए मोहन भागवत ने कहा कि यह पूरी दुनिया को एक एकीकृत इकाई के रूप में देखता है और सद्भाव व सार्वभौमिक भाईचारे को बढ़ावा देता है। उन्होंने कहा कि भारत को अपनी प्रगति के साथ-साथ दुनिया को विकास का एक नया मॉडल भी दिखाना चाहिए।
हिंदू परिप्रेक्ष्य को समझाते हुए उन्होंने बताया कि यह किसी विशेष पूजा पद्धति, खान-पान, रीति-रिवाजों या भाषा को अनिवार्य नहीं बनाता। उन्होंने इसे मानवता और मानवीय संस्कृति का धर्म बताया, जिसकी मुख्य विशेषता आध्यात्मिकता और सार्वभौमिक भाईचारा है।