नेपाल की बाढ़ पर 44 देशों की बड़ी बैठक, जलवायु न्याय की उठी जोरदार मांग

Sushma Kumari5 September 20263 min read78 viewsWorld
नेपाल की बाढ़ पर 44 देशों की बड़ी बैठक, जलवायु न्याय की उठी जोरदार मांग

नेपाल समेत दुनिया भर में जलवायु परिवर्तन से भारी आपदा झेल रहे देशों के समर्थन में 44 अल्पविकसित देशों ने एक होकर जलवायु न्याय की मांग उठाई है। टिमोर-लेस्ते की राजधानी दिली में एक बड़ा सम्मेलन हुआ जिसमें सभी देशों ने मिलकर भोटेकोशी नदी में आई भयंकर बाढ़ से हुई तबाही पर गहरा दुख जताया। इन देशों ने नेपाल की जनता के साथ अपनी एकजुटता और संवेदना साफ शब्दों में जाहिर की है ताकि संकट की इस घड़ी में नेपाल अकेला महसूस न करे।

हिमस्खलन और बाढ़ से हुआ भारी नुकसान

सम्मेलन में शामिल सभी देशों ने माना कि हाल के दिनों में हिमालयी क्षेत्र में मौसम के बदलते मिजाज के कारण भयंकर हिमस्खलन और पहाड़ खिसकने की घटनाएं तेजी से बढ़ी हैं। इन प्राकृतिक आपदाओं की वजह से नेपाल में अचानक भीषण बाढ़ आ गई जिससे बड़े पैमाने पर आम जनता की जान और संपत्ति का नुकसान हुआ है। इन 44 देशों के प्रतिनिधियों ने पीड़ित परिवारों के प्रति अपनी गहरी संवेदना व्यक्त करते हुए कहा कि आज पूरी दुनिया को मिलकर उन देशों की मदद करनी चाहिए जो इस बड़े जलवायु संकट की मार झेल रहे हैं।

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जलवायु वित्त और अनुदान की मांग

बैठक में यह बात सामने आई कि गरीब और विकासशील देश पहले से ही पूंजी की ऊंची लागत और भारी कर्ज के बोझ तले दबे हुए हैं। ऐसे में जलवायु संकट से होने वाले नुकसान की भरपाई के लिए अनुदान आधारित संसाधनों की बहुत जरूरत है। सम्मेलन के दौरान मांग की गई कि अल्पविकसित देशों को आसानी से और बढ़ी हुई मात्रा में गुणवत्तापूर्ण जलवायु वित्त मिलना चाहिए ताकि वे आपदाओं से निपट सकें और अपने लोगों को सुरक्षित रख सकें।

ऐतिहासिक रूप से जिम्मेदार देशों से मुआवजे की मांग

इन 44 देशों ने साफ तौर पर उन अमीर और विकसित देशों पर निशाना साधा जो इतिहास में ज्यादा कार्बन उत्सर्जन के लिए जिम्मेदार रहे हैं। उनका कहना था कि आज दुनिया में जलवायु परिवर्तन का सबसे बुरा असर उन देशों पर पड़ रहा है जिनका वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में योगदान बहुत कम है। इसलिए जिन देशों ने ज्यादा प्रदूषण फैलाया है, उन्हें आगे आकर जलवायु संकट से होने वाले नुकसान की भरपाई करनी चाहिए ताकि गरीब देशों को राहत मिल सके।

वर्ष 2035 तक सहायता राशि बढ़ाने का लक्ष्य

सम्मेलन में एक बड़ा फैसला लेते हुए मांग की गई कि वर्ष 2035 तक जलवायु से जुड़ी वित्तीय सहायता को बढ़ाकर सालाना कम से कम 128 अरब अमेरिकी डॉलर किया जाए। इसके साथ ही वैश्विक तापमान में हो रही वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस से नीचे रखने के पुराने लक्ष्य को और ज्यादा सख्ती से लागू करने पर जोर दिया गया। देशों का मानना था कि अगर समय रहते तापमान को नियंत्रित नहीं किया गया तो आने वाले दिनों में स्थिति और अधिक खतरनाक हो जाएगी।

तकनीकी सहायता और निवेश की जरूरत

बैठक के अंत में इस बात पर जोर दिया गया कि विकासशील और अल्पविकसित देशों को उनके कार्बन उत्सर्जन को कम करने के प्रयासों के बदले आधुनिक और साफ-सुथरी तकनीक मिलनी चाहिए। वैश्विक समुदाय की यह मुख्य जिम्मेदारी होनी चाहिए कि वह ऐसे देशों को वित्तीय और तकनीकी रूप से मजबूत बनाए ताकि वे भविष्य में आने वाली किसी भी प्राकृतिक आपदा का डटकर मुकाबला कर सकें।

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