Nepal: नेपाल में धूमधाम से हुआ भगवान विश्वकर्मा का विसर्जन, बागमती नदी के किनारे पहुंचे भक्त

नेपाल की राजधानी काठमांडू में इस साल भी भगवान विश्वकर्मा की मूर्तियों का विसर्जन बहुत ही धूमधाम और पारंपरिक तरीके से किया गया। कारीगरों, शिल्पकारों और वैज्ञानिकों के आराध्य देव भगवान विश्वकर्मा की मूर्तियों को नदी के तट पर ले जाया गया जहाँ लोगों ने विधि-विधान से पूजा-अर्चना की और फिर उन्हें पानी में विसर्जित कर दिया। इस दौरान देश के कई हिस्सों से धातु का काम करने वाले और तमाम भक्त अपनी श्रद्धा दिखाने के लिए बड़ी संख्या में एकत्र हुए थे।
चोवर गार्ज के पास बागमती नदी के तट पर दर्जनों मूर्तियां लाई गई थीं जहाँ सभी ने मिलकर भगवान को विदाई दी। इस मौके पर मौजूद एक भक्त कमलेश पटेल ने बताया कि उनके परिवार के लोग, स्टाफ और पूरा कारीगर समुदाय इस विसर्जन कार्यक्रम में शामिल हुआ। उन्होंने कहा कि विसर्जन के बाद सभी ने खुद को बहुत धन्य महसूस किया और भगवान विश्वकर्मा से अपने काम में तरक्की और आशीर्वाद की कामना की।
पौराणिक कथाओं में भगवान विश्वकर्मा का महत्व
हिंदू धर्म की मान्यताओं के अनुसार भगवान विश्वकर्मा को सभी देवताओं का मुख्य वास्तुकार और आधिकारिक निर्माता माना जाता है। पौराणिक कथाओं में इस बात का जिक्र मिलता है कि उन्होंने ही देवी-देवताओं के सभी महलों, उड़ने वाले रथों और युद्ध के लिए हथियारों का डिजाइन तैयार किया था। दुनिया के सबसे बड़े महाकाव्य महाभारत में भी उनकी महिमा का वर्णन किया गया है। उन्हें कला का स्वामी, हजारों तरह के हस्तशिल्प बनाने वाला, देवताओं का बढ़ई, सबसे श्रेष्ठ शिल्पकार और सभी प्रकार के आभूषण गढ़ने वाला अमर देवता बताया गया है।
पूजा और विसर्जन की परंपरा
नेपाल में यह परंपरा बहुत पुरानी है। इस साल आश्विन महीने के पहले दिन यानी 17 सितंबर को विश्वकर्मा पूजा की गई थी और उसके ठीक अगले दिन यानी 18 सितंबर को यह विसर्जन किया गया। नेपाल में मुख्य रूप से दशैं यानी दुर्गा पूजा के त्योहार की नौवीं तिथि यानी नवमी के दिन विश्वकर्मा पूजा करने की परंपरा है, हालांकि कुछ लोग इसे दीपावली के समय भी मनाते हैं। यह दिन उन सभी लोगों के प्रति सम्मान व्यक्त करने का होता है जो तकनीक के क्षेत्र में नए आविष्कार करते हैं और समाज की भलाई के लिए भौतिकी या निर्माण कार्य से जुड़े रहते हैं।
चारों युगों में जुड़े हैं निर्माण कार्य
भगवान विश्वकर्मा के चार हाथ हैं जिनमें वे मुकुट पहने हुए जल का बर्तन, पुस्तक, फंदा और शिल्पकारों के औजार थामे रहते हैं। हिंदू पौराणिक इतिहास के अनुसार इस पृथ्वी के समय को चार युगों में बांटा गया है जो सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलियुग हैं। भगवान विश्वकर्मा ने इन सभी युगों में देवताओं के लिए कई नगरों और महलों का निर्माण किया था। सतयुग में उन्होंने देवताओं के रहने के लिए स्वर्ग लोक बनाया, त्रेतायुग में रावण की लंका का निर्माण किया, द्वापरयुग में द्वारका नगरी बसाई और कलियुग में हस्तिनापुर तथा इंद्रप्रस्थ जैसे प्रसिद्ध नगरों को आकार दिया।
मशीनों की पूजा और पतंगबाजी का दौर
विश्वकर्मा पूजा का दिन कामगारों और कारीगरों के लिए अपने काम में उत्पादकता बढ़ाने और नई चीजें बनाने के लिए प्रेरित होने का समय होता है। यह उत्सव आमतौर पर फैक्ट्रियों, दुकानों, कार्यालयों और वर्कशॉप के अंदर मनाया जाता है। इस दौरान मशीनों और वाहनों की विशेष पूजा की जाती है। मशीनों पर लाल और सफेद कपड़े तथा पवित्र धागे बांधे जाते हैं। पूजा के बाद नेपाल के कई हिस्सों में भगवान विश्वकर्मा की तस्वीर के साथ शोभायात्रा भी निकाली जाती है। लोग चौराहों के कोनों और गलियों में उनकी मूर्तियां स्थापित करते हैं। इस पूजा के साथ ही नेपाल में पतंग उड़ाने का चलन भी शुरू हो जाता है जो सीधे दीपावली तक चलने वाले लंबे त्योहारी सीजन की शुरुआत का संकेत देता है।