नेपाल के पीएम बलेंद्र शाह ने हिमालयी बाढ़ के बाद की वैश्विक जलवायु कार्रवाई की मांग, कहा संकट गंभीर.

नेपाल के प्रधानमंत्री बलेंद्र शाह ने हाल ही में हिमालयी क्षेत्र में मचे भारी कोहराम के बाद अंतरराष्ट्रीय समुदाय से तुरंत मदद की गुहार लगाई है। 2 सितंबर 2026 को हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स को संबोधित करते हुए उन्होंने साफ कहा कि जलवायु परिवर्तन की वजह से देश में भयानक तबाही आई है। उन्होंने भोटेकोशी नदी में आई उस खतरनाक बाढ़ का जिक्र किया जो बर्फ और चट्टानों के बड़े हिमस्खलन की वजह से आई थी। इस पूरे इलाके में तापमान 1.8 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ चुका है और इसे क्षेत्र के इतिहास की सबसे बड़ी आपदाओं में गिना जा रहा है।
भयानक तबाही और सरकारी आंकड़े
इस भीषण फ्लैश फ्लड यानी अचानक आई बाढ़ की वजह से देश में मरने वालों का आधिकारिक आंकड़ा 1,127 तक पहुंच गया है। राहत और बचाव टीमें अभी भी दिन-रात काम कर रही हैं और लगभग 4,858 लोग लापता बताए जा रहे हैं जिनकी तलाश जारी है। इस बड़े खतरे से पहले नेपाली सरकार ने एहतियात के तौर पर नागरिकों के मोबाइल पर 1.1 मिलियन यानी 11 लाख एसएमएस अलर्ट भेजे थे ताकि लोग समय रहते सतर्क हो सकें। अब जैसे-जैसे शुरुआती रेस्क्यू ऑपरेशन खत्म हो रहा है, सरकार का पूरा ध्यान लोगों के पुनर्वास और उनकी लंबी देखभाल पर शिफ्ट हो रहा है, जिसके तहत पीड़ितों को मेडिकल सहायता और मानसिक परामर्श यानी साइकोसोशाल काउंसलिंग दी जा रही है।
मुआवजे की मांग और वैश्विक जिम्मेदारी
बीते 1 सितंबर 2026 को नेपाल सरकार ने आधिकारिक तौर पर 'फंड फॉर रेस्पॉन्डिंग टू लॉस एंड डैमेज' के बोर्ड के पास जाकर सीधी और तुरंत मदद की अपील की है। सरकार के नुमाइंदों ने साफ तौर पर लोन लेने के बजाय मुआवजे की मांग की है, क्योंकि नेपाल ग्लोबल ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में 0.1% से भी कम योगदान देता है, लेकिन इसके बावजूद उसे सबसे ज्यादा जलवायु खतरों का सामना करना पड़ रहा है। जलवायु नीति विशेषज्ञ और यूएन के वार्ताकार मनजीत ढकल ने इस बात पर जोर दिया कि कुछ इलाके अब ऐसे हो गए हैं जहां सुधार की सीमाएं पार हो चुकी हैं और वहां दोबारा निर्माण करना नामुमकिन सा हो गया है।
मंत्रियों के बयान और वैज्ञानिक चेतावनी
वन और पर्यावरण मंत्री गीता चौधरी और विदेश मंत्री शिशिर खनाल समेत कई सरकारी अधिकारियों ने प्रधानमंत्री के इस रुख का पूरा समर्थन किया है। विदेश मंत्री शिशिर खनाल ने ग्लेशियर के टूटने की इस घटना को पूरी दुनिया के लिए एक बड़ी चेतावनी बताया है और जलवायु न्याय के तहत अंतरराष्ट्रीय समर्थन की मांग की है। संयुक्त राष्ट्र के आकलन से जुड़े वैज्ञानिक एक्सपर्ट्स ने भी 2 सितंबर को यह कन्फर्म किया कि जलवायु परिवर्तन की वजह से ग्लेशियर बहुत तेजी से पिघल रहे हैं, जिसकी वजह से भविष्य में इस तरह की हिमालयी आपदाओं का खतरा और ज्यादा बढ़ गया है। प्रधानमंत्री बलेंद्र शाह ने एक बार फिर दोहराया कि चूंकि जलवायु परिवर्तन की जड़ें पूरी दुनिया से जुड़ी हैं, इसलिए अंतरराष्ट्रीय समुदाय को इसके असर को कम करने और हालात को संभालने की जिम्मेदारी उठानी ही होगी।