नेपाल सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: विधवा के दूसरी शादी पर नहीं छिनेगी संपत्ति

पड़ोसी देश नेपाल की न्यायव्यवस्था ने महिलाओं के अधिकारों को एक नई मजबूती देते हुए ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। नेपाल के सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण आदेश में साफ कर दिया है कि यदि कोई विधवा महिला अपने पति की मृत्यु के बाद दूसरी शादी करती है, तो उसे पहले पति से हिस्से में मिली संपत्ति अपनी पहली संतान को ट्रांसफर करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। अदालत ने पुराने कानूनी प्रावधान को संविधान के मूलभूत अधिकारों के खिलाफ मानते हुए पूरी तरह से खारिज कर दिया है।
क्या था पुराना कानून और क्यों उठा विवाद?
मुलुकी देवानी संहिता की एक धारा के तहत यह नियम था कि यदि कोई विधवा दूसरी शादी करती है और उसके पहले पति से बच्चे हैं, तो उसे मृत पति के हिस्से से मिली संपत्ति उन बच्चों के नाम करनी होगी। महिला अधिकार कार्यकर्ताओं और अधिवक्ताओं ने इस कानून के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में आवाज उठाई थी। याचिका में दलील दी गई थी कि यदि पति की मृत्यु के बाद पत्नी दूसरी शादी करती है तो उसपर संपत्ति छोड़ने का दबाव होता है, लेकिन यदि पत्नी की मृत्यु के बाद पति दोबारा शादी करे तो उस पर ऐसा कोई नियम लागू नहीं होता। अदालत ने इस दोहरे रवैये और लैंगिक भेदभाव को पूरी तरह से असंवैधानिक करार दिया।
संविधान के इन अधिकारों का हो रहा था हनन
न्यायालय की संवैधानिक पीठ ने सुनवाई के बाद स्पष्ट किया कि यह पुराना प्रावधान नेपाल के संविधान द्वारा नागरिकों को दिए गए कई बुनियादी अधिकारों का सीधा उल्लंघन करता है:
- समानता का अधिकार: कानून पुरुष और महिला के बीच विवाह और पुनर्विवाह के मामलों में भेद पैदा कर रहा था।
- सम्मानपूर्वक जीने का अधिकार: संपत्ति पर अनुचित पाबंदी लगाने से विधवा महिलाएं आर्थिक रूप से कमजोर और असुरक्षित महसूस करती थीं।
- संपत्ति का अधिकार: कानूनी रूप से बंटवारे के बाद मिली संपत्ति पर महिला का पूर्ण अधिकार होता है, जिसे केवल दोबारा शादी करने के आधार पर छीना नहीं जा सकता।
- पारिवारिक जीवन की स्वतंत्रता: इस नियम की वजह से महिलाओं पर एक अजीब मानसिक और सामाजिक दबाव रहता था, जिससे वे दूसरा विवाह करने से डरती थीं।
अदालत की मुख्य टिप्पणियां
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी जोड़ा कि बच्चों की देखभाल और परवरिश की जिम्मेदारी माता-पिता दोनों की होती है, लेकिन केवल मां के पुनर्विवाह के आधार पर उसकी निजी संपत्ति पर तलवार लटकाना न्यायसंगत नहीं है। अदालत ने कहा कि एक बार जब किसी को कानूनी प्रक्रिया के तहत संपत्ति में उसका हिस्सा मिल जाता है, तो वह उसकी अपनी निजी संपत्ति बन जाती है। उस संपत्ति के उपयोग, बिक्री या अधिकार पर रोक लगाना किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता में अनावश्यक हस्तक्षेप है। इस फैसले के आने के बाद नेपाल की महिलाओं में खुशी की लहर है और इसे लैंगिक न्याय की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।