Nepal-Tibet Border Disaster: नेपाल और तिब्बत सीमा पर बड़ा ग्लेशियर टूटने से भारी तबाही, 350 से ज्यादा लोगों की मौत और 1300 से अधिक लापता.

नेपाल और तिब्बत की सीमा पर एक बड़ा हादसा हुआ है, जहां 26 अगस्त 2026 को भारी ग्लेशियर टूटने की वजह से भयंकर बाढ़ आ गई। इस आपदा ने पूरे इलाके में भारी तबाही मचाई है और सैटेलाइट तस्वीरों से इस बड़े नुकसान की पुष्टि हुई है। इस भयंकर घटना के बाद से आम लोगों में डर का माहौल है और राहत तथा बचाव का काम तेजी से किया जा रहा है ताकि फंसे हुए लोगों को सुरक्षित बाहर निकाला जा सके।
ग्लेशियर टूटने से आई तबाही और सैटेलाइट से हुआ खुलासा
सैटेलाइट से मिली तस्वीरों में देखा गया है कि नेपाल और तिब्बत की सीमा पर बड़े पैमाने पर तबाही हुई है। Planet Labs, ISRO, NASA और यूरोपियन स्पेस एजेंसी की तस्वीरों से पता चलता है कि जो पहाड़ पहले हरे-भरे दिखते थे, वे अब केवल कीचड़ और भूरे मलबे से ढके हुए हैं। सिक्किम यूनिवर्सिटी के विक्रम गुप्ता और कैलगरी यूनिवर्सिटी के डैन शुगर जैसे विशेषज्ञों ने कन्फर्म किया है कि यह आपदा 5,200 मीटर की ऊंचाई वाले ग्लेशियर से बर्फ और चट्टान के खिसकने के कारण हुई थी। यह मलबा 1,200 मीटर नीचे घाटी में आ गिरा था। नेपाल के राष्ट्रीय आपदा जोखिम न्यूनीकरण और प्रबंधन प्राधिकरण के प्रकाश पोखरेल ने इसे पानी और बड़े पत्थरों का एक विशाल सैलाब बताया।
इस दौरान 5.2 तीव्रता का भूकंपीय झटका भी दर्ज किया गया था, लेकिन अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (USGS) ने साफ किया कि यह झटका किसी स्वतंत्र भूकंप की वजह से नहीं बल्कि ग्लेशियर के गिरने की वजह से ही पैदा हुआ था। इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट (ICIMOD) ने जानकारी दी कि त्रिशूली नदी यानी भोटे कोशी में पानी का स्तर मात्र 30 मिनट के भीतर नौ मीटर यानी करीब 27 फीट तक बढ़ गया था।
मौतों का आंकड़ा और लापता लोगों की जानकारी
गुरुवार, 27 अगस्त 2026 तक नेपाल में मरने वालों की संख्या 270 से 353 के बीच बताई जा रही है, जबकि तिब्बत में 3 लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी है। इस आपदा में 1,300 से ज्यादा लोग अभी भी लापता हैं। लापता लोगों में 177 भारतीय, 63 से 65 अमेरिकी, 33 से 34 ब्रिटिश, 34 से 35 ऑस्ट्रेलियाई और 24 से 25 कनाडाई नागरिक शामिल हैं। नेपाल में लगभग 1,200 लोग बेघर हो चुके हैं और बुनियादी ढांचे को भारी नुकसान पहुंचा है। कई पुल टूट गए हैं और लगभग 40 किलोमीटर यानी 25 मील लंबी सड़क नेटवर्क तबाह हो गई है। नेपाल सेना ने हेलिकॉप्टर की मदद से 100 से ज्यादा जीवित बचे लोगों को सुरक्षित निकाला है और जरूरी राहत सामग्री पहुंचाई है। बिजली का ढांचा बुरी तरह टूटने से कई इलाकों में बिजली गुल हो गई है।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मिल रही है मदद
इस मुश्किल समय में दुनिया के कई देश मदद के लिए आगे आए हैं। भारत ने राहत सामग्री के तौर पर 10 मीट्रिक टन सामान भेजा है, जबकि अमेरिका ने 500,000 डॉलर देने का वादा किया है और अपना आपदा प्रतिक्रिया सलाहकार भेजा है। IFRC ने आपातकालीन फंड के रूप में 1 मिलियन स्विस फ़्रังก์ जारी किए हैं और WHO नेपाल ने जरूरी दवाइयां मुहैया कराई हैं। यूरोपीय संघ ने मैपिंग के लिए कोपरनिकस सैटेलाइट सिस्टम को एक्टिव कर दिया है। चीन के अधिकारी भी राहत कार्यों में जुटे हैं और उन्होंने ग्यारॉन्ग में ऊपर की तरफ बने एक नई झील के फटने का खतरा जताया है और लोगों को चेतावनी दी है। विशेषज्ञों का मानना है कि बढ़ते तापमान और जलवायु परिवर्तन की वजह से ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं, जिससे इस तरह की घटनाओं का खतरा और भी ज्यादा बढ़ गया है।