खाड़ी देशों के प्रसिद्ध शिक्षाविद् एनके रामचंद्रन मेनन का निधन

खाड़ी देशों में शिक्षा जगत को एक नई दिशा देने वाले और नौ स्कूलों का एक विशाल नेटवर्क स्थापित करने वाले दूरदर्शी शिक्षाविद् एनके रामचंद्रन मेनन अब हमारे बीच नहीं रहे। केरल में 78 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया, जिससे प्रवासी भारतीयों और शिक्षा जगत में शोक की लहर दौड़ गई है। उनके निधन पर यूएई, कुवैत और बहरीन समेत कई देशों से शोक संवेदनाएं व्यक्त की जा रही हैं।
बैंकर से बने थे शिक्षा के दिग्गज
मूल रूप से केरल के रहने वाले रामचंद्रन मेनन साल 1969 में एक बैंकर के तौर पर कुवैत आए थे। हालांकि, समय के साथ उनका रुझान शिक्षा के क्षेत्र की ओर बढ़ा और उन्होंने इसे ही अपना मिशन बना लिया। वर्ष 2000 में उन्होंने भारत की प्रतिष्ठित संस्था 'भारतीय विद्या भवन' को मध्य पूर्व में लाने की योजना पर काम शुरू किया। उनकी मेहनत रंग लाई और उन्होंने साल 2006 में कुवैत में अपने पहले स्कूल की नींव रखी। इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा और खाड़ी देशों में शिक्षा की अलख जगाते चले गए।
विशाल स्कूल नेटवर्क की स्थापना
एनके रामचंद्रन मेनन के नेतृत्व में स्थापित किए गए शिक्षण संस्थानों का दायरा यूएई, कुवैत और बहरीन तक फैला हुआ है। उनके इस सफर में:
- कुवैत में पहला स्कूल (भारतीय एजुकेशनल स्कूल) 2006 में शुरू हुआ।
- साल 2010 में अबू धाबी में प्राइवेट इंटरनेशनल इंग्लिश स्कूल की शुरुआत हुई।
- इसके बाद अल Ain, बहरीन, दुबई और शारजाह में भी कई स्कूलों और नर्सरी की स्थापना की गई।
- अगस्त 2026 में अबू धाबी में खुला पर्ल हेरिटेज स्कूल इस कड़ी का सबसे नया हिस्सा था।
उनकी इस अद्भुत दूरदर्शिता और योगदान को देखते हुए उन्हें साल 2022 के शुरुआती महीनों में यूएई का प्रतिष्ठित गोल्डन वीजा भी प्रदान किया गया था। वह इस सम्मान को पाने वाले कुवैत के पहले भारत-आधारित पेशेवर थे।
नम आंखों से दी गई अंतिम विदाई
अलुवा स्थित उनके पैतृक निवास पर उनका अंतिम संस्कार संपन्न हुआ, जिसमें शामिल होने के लिए यूएई, कुवैत और बहरीन से तमाम स्कूलों के प्रधानाचार्य, प्रशासनिक प्रबंधक और स्टाफ सदस्य विशेष रूप से केरल पहुंचे। उनके परिवार में उनकी पत्नी सुधा रामचंद्रन और दो बच्चे दिव्या और सूरज हैं, जो यूएई में रहकर इस संस्थान के संचालन में अहम भूमिका निभा रहे हैं।
उनके सहयोगियों और प्राचार्यों का कहना है कि मेनन सिर्फ इमारतें या संस्थान नहीं बनाते थे, बल्कि वे लोगों को गढ़ते थे। उनका मानना था कि शिक्षा केवल किताबी ज्ञान नहीं, बल्कि एक जिम्मेदार और नेक इंसान बनाने का जरिया है। उनके द्वारा स्थापित शैक्षणिक संस्थान आने वाले कई वर्षों तक उनकी याद दिलाते रहेंगे और छात्रों के भविष्य को संवारते रहेंगे।