मध्य पूर्व में तनाव: कच्चे तेल की कीमत 200 डॉलर तक जा सकती है, विटोल CEO की चेतावनी

Gautam Sahu6 October 20262 min read0 viewsWorld
मध्य पूर्व में तनाव: कच्चे तेल की कीमत 200 डॉलर तक जा सकती है, विटोल CEO की चेतावनी

दुनिया के ऊर्जा बाजार में एक बार फिर हलचल मच गई है। कमोडिटी ट्रेडिंग की दिग्गज कंपनी विटोल (Vitol) के सीईओ रसेल हार्डी ने एक गंभीर चेतावनी जारी की है। उन्होंने कहा है कि अगर मध्य पूर्व से कच्चे तेल के निर्यात में पूरी तरह से रुकावट आती है, तो तेल की कीमतें आसमान छू सकती हैं और 200 डॉलर प्रति बैरल के स्तर तक पहुंच सकती हैं।

हालांकि, 6 अक्टूबर 2026 के बाजार आंकड़ों के अनुसार, फिलहाल कीमतें स्थिर दिख रही हैं। ब्रेंट क्रूड 100 से 100.59 डॉलर और अमेरिकी वेस्ट टेक्सस इंटरमीडिएट (WTI) 88 से 89 डॉलर के बीच कारोबार कर रहा है। इस स्थिरता की बड़ी वजह यह है कि सितंबर के अंत में मध्य पूर्व से निर्यात की मात्रा युद्ध-पूर्व के स्तर से भी अधिक रही है। साथ ही, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रोत्साहन पर G7 देशों ने आपातकालीन भंडार से 100 मिलियन बैरल डीजल और कच्चा तेल जारी करने का फैसला किया है, जिससे बाजार को कुछ राहत मिली है।

आपूर्ति संकट और भू-राजनीतिक तनाव

GulfHindi की हर खबर सबसे पहलेJoin

भले ही फिलहाल कीमतें काबू में दिख रही हों, लेकिन उद्योग जगत के दिग्गजों का मानना है कि दबाव अभी भी बना हुआ है। सऊदी अरामको के सीईओ अमीन नासिर ने स्पष्ट किया है कि यदि अमेरिका और ईरान के बीच संघर्ष जारी रहता है, तो वैश्विक तेल भंडारों को वापस सामान्य होने में दो साल तक का समय लग सकता है। नासिर के अनुसार, फरवरी के अंत से सैन्य हमलों के कारण लगभग 3 बिलियन बैरल आपूर्ति का नुकसान हुआ है।

उन्होंने चेतावनी दी कि जब तक होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) पूरी तरह से नहीं खुल जाता और बाजार का भरोसा वापस नहीं आता, तब तक ऊर्जा प्रणाली तनावपूर्ण बनी रहेगी। इसके अलावा, यमन में हूती बलों की गतिविधियों और समुद्री सुरक्षा खतरों ने लॉजिस्टिक्स को जटिल बना दिया है, जिससे परिवहन लागत और बीमा प्रीमियम में भारी बढ़ोतरी हुई है।

रसेल हार्डी ने पहले भी संकेत दिए थे कि अमेरिका-ईरान संघर्ष के कारण आपूर्ति में भारी गिरावट आई है। उन्होंने अनुमान लगाया था कि वैश्विक तेल की मांग 2025 की तुलना में इस वर्ष 1.5 मिलियन बैरल प्रति दिन कम हो सकती है। हालांकि कुवैत जैसे उत्पादक देश अपनी उत्पादन क्षमता को युद्ध-पूर्व के 75% तक ले आए हैं और सऊदी अरब एशियाई बाजारों में अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए कीमतों में बदलाव कर रहा है, लेकिन जोखिम अभी भी बरकरार है।

Share:

Comments

Leave a comment