Pakistan और Kuwait के बीच नया रक्षा समझौता साइन, जानिए क्या हैं इस डील की बड़ी बातें.

पाकिस्तान और कुवैत ने आपसी रिश्तों को और ज्यादा मजबूत करने के लिए एक बड़ा कदम उठाया है। दोनों देशों ने मिलकर गुरुवार, 27 अगस्त 2026 को रावलपिंडी में Protocol Agreement-2026 पर औपचारिक रूप से हस्ताक्षर किए। यह नया समझौता साल 2023 में बने सैन्य सहयोग के दायरे को और आगे बढ़ाएगा। इस बारे में अधिक जानकारी आप UNI India की रिपोर्ट में देख सकते हैं। यह दस्तावेज जुलाई 2026 में कुवैत द्वारा साल 2023 के रक्षा समझौते को मंजूरी मिलने के बाद सामने आया है। यह नया समझौता अगले 5 सालों तक लागू रहेगा और इसमें अपने आप आगे बढ़ने का प्रावधान भी शामिल है। इस महत्वपूर्ण समझौते पर पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ और कुवैत के रक्षा मंत्री शेख अब्दुल्ला अली अब्दुल्ला अल-सSalem अल-सबा ने हस्ताक्षर किए।
सैनिकों की ट्रेनिंग और सुरक्षा सहयोग
पाकिस्तान के रक्षा मंत्रालय की तरफ से यह बताया गया है कि उसके सशस्त्र बल कुवैत को ट्रेनिंग, क्षमता बढ़ाने, बॉर्डर मैनेजमेंट और अन्य सहमति वाले रक्षा क्षेत्रों में पूरी मदद देंगे। इस समझौते का दायरा काफी बड़ा है। इसमें संयुक्त सैन्य प्रशिक्षण, खुफिया जानकारी साझा करना, लॉजिस्टिक्स, रक्षा तकनीक पर रिसर्च, इलेक्ट्रॉनिक कम्युनिकेशन और सैन्य निर्माण का विकास शामिल है। कुवैत के रक्षा मंत्रालय ने इस समझौते को क्षेत्रीय सुरक्षा और द्विपक्षीय सहयोग के लिए एक बहुत बड़ा मील का पत्थर बताया है।
क्षेत्रीय सुरक्षा और विश्लेषकों की राय
क्षेत्रीय सुरक्षा के जानकारों का यह कहना है कि यह समझौता ऐसे समय में आया है जब अमेरिका और ईरान के बीच तनाव लगातार बढ़ रहा है। इस तनाव की वजह से कुवैत पर ईरानी मिसाइल और ड्रोन हमलों का खतरा भी बढ़ गया है। पाकिस्तान के पूर्व जनरल और रक्षा विश्लेषक जाकिद महमूद ने यह बात बताई कि सऊदी अरब के साथ पाकिस्तान के रणनीतिक समझौते या मक्का पैक्ट से अलग, यह कुवैत वाला समझौता बाहरी आक्रमण से रक्षा करने के बजाय ऑपरेशनल तालमेल और लॉजिस्टिक्स पर ज्यादा ध्यान देता है। कुवैत के रिटायर एयर फोर्स मेजर जनरल यौफ अल-मुल्ला ने इस साझेदारी का श्रेय पाकिस्तान की बढ़ती सैन्य-औद्योगिक क्षमता और परमाणु देश होने की स्थिति को दिया है।
आर्थिक फायदे और कामगारों से जुड़ी उम्मीदें
इतनी गहरी रक्षा साझेदारी के बाद भी विश्लेषक इस बात पर सवाल उठा रहे हैं कि इससे इस्लामाबाद को असल में क्या आर्थिक फायदा मिलेगा। पिछले वित्तीय वर्ष में पाकिस्तान को कुल $41.6 बिलियन की रेमिटेंस यानी विदेश से पैसा मिला था, जिसमें से लगभग आधा हिस्सा अकेले सऊदी अरब और यूएई से आया था। हालांकि, साल 2023 में खाड़ी देशों से जितने निवेश का अनुमान $100 बिलियन लगाया गया था, असल निवेश उससे काफी कम रहा है। अधिकारियों को यह उम्मीद है कि इस समझौते से रणनीतिक महत्व बढ़ सकता है और शायद कामगारों के लिए वीजा कोटा भी बढ़ सकता है। इसके बावजूद, कुछ विश्लेषकों का यह भी मानना है कि इस तरह के करीबी सैन्य संबंधों से पाकिस्तान किसी क्षेत्रीय संघर्ष में फंस सकता है। साथ ही, पाकिस्तान के इस भरोसे के बाद भी कि वह अपने लड़ाकू सैनिक तैनात नहीं करेगा, यह वाशिंगटन और तेहरान के बीच एक राजनयिक मध्यस्थ के रूप में उसकी भूमिका को कमजोर कर सकता है।