पाकिस्तान में डॉक्टरों के खिलाफ बढ़ती हिंसा और कानूनी कार्रवाई से स्वास्थ्य व्यवस्था चरमरा रही है और अब डॉक्टर गंभीर मरीजों के इलाज से डर रहे हैं

कराची (पाकिस्तान): पाकिस्तान में स्वास्थ्य कर्मियों के खिलाफ बढ़ते उत्पीड़न, हिंसा और आपराधिक मामलों ने देश की नाजुक स्वास्थ्य प्रणाली को खतरे में डाल दिया है। मेडिकल एसोसिएशनों ने चेतावनी दी है कि कानूनी कार्रवाई के डर से अब डॉक्टर गंभीर मरीजों का इलाज करने से कतरा रहे हैं।
यह चेतावनी हाल ही में हुई कई घटनाओं के बाद आई है। इनमें लाहौर में एक महिला डॉक्टर के साथ कथित मारपीट, हैदराबाद के लियाकत यूनिवर्सिटी अस्पताल में 27 डॉक्टरों के खिलाफ एफआईआर दर्ज होना और कराची के डॉ रूथ फाऊ सिविल अस्पताल के कर्मचारियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई शामिल है।
पाकिस्तान मेडिकल एसोसिएशन (PMA) ने इस स्थिति को चिंताजनक बताया है। एसोसिएशन के मुताबिक देश की स्वास्थ्य वितरण प्रणाली अब एक गंभीर विफलता की ओर बढ़ रही है।
एसोसिएशन के डॉ अब्दुल गफूर शोरो ने बताया कि चिकित्सा पेशेवर भारी मनोवैज्ञानिक दबाव, सार्वजनिक अपमान और प्रशासनिक उत्पीड़न के बीच काम कर रहे हैं। इस माहौल की वजह से अनुभवी विशेषज्ञ और युवा डॉक्टर क्लिनिकल प्रैक्टिस छोड़ने या विदेश जाने पर विचार कर रहे हैं।
शोरो ने तर्क दिया कि मेडिकल प्रैक्टिस को अब एक आपराधिक गतिविधि की तरह देखा जा रहा है। डॉक्टरों, सर्जनों और प्रशिक्षुओं पर पाकिस्तान दंड संहिता की धारा 302 और 322 के तहत हत्या से संबंधित आरोप लगाए जा रहे हैं और इलाज के प्रतिकूल परिणामों पर भारी मुआवजे के दावे किए जा रहे हैं।
उन्होंने इस बात पर भी चिंता जताई कि सीनियर प्रोफेसरों, विभागाध्यक्षों और पोस्टग्रेजुएट प्रशिक्षुओं सहित पूरे अस्पताल विभागों के खिलाफ गैर-जमानती गिरफ्तारी वारंट जारी किए जा रहे हैं।
PMA ने अधिकारियों की आलोचना करते हुए कहा कि चिकित्सा लापरवाही की शिकायतों को पहले स्वास्थ्य आयोगों या स्वतंत्र मेडिकल रिव्यू बोर्डों के पास भेजने के बजाय सीधे आपराधिक अदालतों में भेजा जा रहा है।
डॉ शोरो के मुताबिक, विशेषज्ञों के मूल्यांकन को नजरअंदाज करने से डॉक्टरों को पुलिस छापेमारी, हिरासत और कानूनी उत्पीड़न का सामना करना पड़ रहा है, जबकि वे संसाधनों की कमी वाले अस्पतालों में काम कर रहे हैं।
एसोसिएशन ने कहा कि ऐसे हालात 'डिफेंसिव मेडिसिन' को बढ़ावा दे रहे हैं। इसमें डॉक्टर मुकदमेबाजी के डर से जोखिम भरे प्रोसीजर करने से बचते हैं या गंभीर रूप से बीमार मरीजों को भर्ती करने में हिचकिचाते हैं। इससे इलाज में देरी हो सकती है और आपातकालीन सेवाएं कमजोर हो सकती हैं, जिससे मरीजों की जान को और अधिक खतरा हो सकता है।