PIMS पाकिस्तान: खरीद में देरी से दवाओं का संकट, मरीजों की जान जोखिम में

पाकिस्तान के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल, पाकिस्तान इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (PIMS) में एक गंभीर संकट खड़ा हो गया है। अस्पताल में मरीजों को मिलने वाली मुफ्त दवाओं और जरूरी मेडिकल सामान की सप्लाई खतरे में है। वजह है सरकारी खरीद प्रक्रिया में होने वाली भारी देरी, जिसने अस्पताल के कामकाज को बुरी तरह प्रभावित किया है।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, पिछले छह हफ्तों से PIMS में एक भी टेंडर साइन नहीं किया गया है। इसका सीधा असर यह है कि अस्पताल में दवाओं और इंजेक्शनों का मौजूदा स्टॉक तेजी से घट रहा है। अस्पताल के अंदर भर्ती मरीजों को सभी दवाएं मुफ्त दी जाती हैं, ऐसे में अगर समय पर नई खेप नहीं आई, तो मरीजों के इलाज में भारी रुकावट आएगी।
प्रशासनिक लापरवाही और फाइलों का अंबार
अस्पताल के वरिष्ठ अधिकारियों का कहना है कि खरीद से जुड़ी फाइलें लंबे समय से लंबित हैं, जिसके कारण स्थिति बदतर होती जा रही है। यह संकट ऐसे समय में आया है जब अस्पताल पहले से ही अगस्त में हुए एक दर्दनाक हादसे से जूझ रहा है, जिसमें आग लगने के कारण 14 नवजात शिशुओं की मौत हो गई थी।
अस्पताल के नेतृत्व में भी हालिया बदलाव देखे गए हैं। नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ (NIH) के प्रमुख डॉ. मोहम्मद सलमान को कार्यकारी निदेशक का अतिरिक्त प्रभार दिया गया था, लेकिन 5 अक्टूबर को उन्हें हटा दिया गया। अब यह जिम्मेदारी शहीद जुल्फिकार अली भुट्टो मेडिकल यूनिवर्सिटी (SZABMU) के कुलपति प्रो. डॉ. तनवीर खालिक को सौंपी गई है।
एक वरिष्ठ डॉक्टर ने बताया कि खरीद की फाइलें केवल हस्ताक्षरों के इंतजार में जमा होती जा रही हैं। साथ ही, खरीद समिति के सदस्यों की सीमित भागीदारी भी एक बड़ी समस्या है, क्योंकि उनमें से कई लोग अन्य विभागों की जिम्मेदारियों में व्यस्त हैं।
दूसरी ओर, वित्त विभाग के एक अधिकारी ने इस देरी का कारण फेडरल बोर्ड ऑफ रिवेन्यू (FBR) से जुड़ी प्रशासनिक प्रक्रियाओं को बताया है। उनका कहना है कि अधिकृत हस्ताक्षरकर्ताओं को बदलने में लगभग दो हफ्ते का समय लगता है, जिससे वित्तीय लेनदेन और मंजूरियों में देरी हो रही है। हालांकि, अधिकारी ने आश्वासन दिया है कि कुछ स्टॉक अभी उपलब्ध है और मामले को सुलझाने की कोशिशें जारी हैं।