पाकिस्तान के सिंध प्रांत में हिंदू लड़कियों का जबरन धर्मांतरण और अपहरण जारी, धार्मिक सद्भाव के दावे निकले खोखले
पाकिस्तान के सिंध प्रांत में हिंदू लड़कियों के अपहरण और जबरन धर्मांतरण की घटनाएं बढ़ी हैं, जिस पर अब अंतरराष्ट्रीय चिंता जताई जा रही है।

हैदराबाद (पाकिस्तान): पाकिस्तान में धार्मिक सद्भाव को बढ़ावा देने के लिए दशकों से किए गए प्रयास जमीन पर नाकाम साबित हुए हैं। सिंध प्रांत में हिंदू अल्पसंख्यकों, खासकर लड़कियों के अपहरण और उनके जबरन धर्मांतरण की घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं, जिससे वहां की स्थिति चिंताजनक बनी हुई है।
क्रिश्चियन स्टडी सर्कल द्वारा एक स्थानीय होटल में आयोजित अंतरधार्मिक संवाद के दौरान राजनीतिक प्रतिनिधियों, धार्मिक नेताओं, वकीलों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इन मुद्दों पर चर्चा की। कार्यक्रम में शामिल लोगों ने धार्मिक कट्टरवाद, भेदभाव और कमजोर समुदायों के खिलाफ हो रहे अत्याचारों को रोकने के लिए एकजुट होकर काम करने की मांग की।
नेशनल असेंबली की पूर्व सदस्य नीलम कुमारी ने आरोप लगाया कि हिंदू लड़कियों का अपहरण कर उनका जबरन धर्म परिवर्तन कराया जा रहा है और उनकी शादियां करवाई जा रही हैं। उन्होंने इसे कानून का खुला उल्लंघन बताया। कुमारी ने यह भी जानकारी दी कि वह उमेरकोट से अपहृत एक लड़की की बरामदगी के लिए उमेरकोट और घोटकी के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षकों के संपर्क में हैं।
नीलम कुमारी के मुताबिक, पाकिस्तान ने अल्पसंख्यक समुदायों की सुरक्षा के लिए कई कानून और विधायी उपाय पेश किए हैं, लेकिन खराब कार्यान्वयन की वजह से इनका असर बहुत कम रहा है।
संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त कार्यालय ने एक प्रेस विज्ञप्ति में कहा कि कानूनी सुरक्षा की कमी और दबाव के कारण हिंदू और ईसाई समुदायों की लड़कियों का जबरन धर्मांतरण कराया जा रहा है। विशेषज्ञों ने जोर दिया कि धर्म परिवर्तन पूरी तरह स्वैच्छिक होना चाहिए और अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत बाल विवाह में सहमति मान्य नहीं होती।
आंकड़ों के मुताबिक, 2025 में रिपोर्ट किए गए मामलों में करीब 75 प्रतिशत पीड़ित हिंदू थे, जबकि 25 प्रतिशत ईसाई थे। इनमें से लगभग 80 प्रतिशत घटनाएं अकेले सिंध प्रांत में हुईं, जिनमें 14 से 18 साल की किशोरियों को सबसे ज्यादा निशाना बनाया गया। कुछ मामलों में पीड़ित लड़कियां इससे भी कम उम्र की थीं।
विशेषज्ञों ने बताया कि गरीबी और हाशिए पर होने के कारण ये लड़कियां अधिक असुरक्षित हो जाती हैं, जिससे उन्हें शारीरिक और यौन शोषण, सामाजिक कलंक और लंबे समय तक मनोवैज्ञानिक सदमे का सामना करना पड़ता है। उन्होंने कहा कि ये महिलाएं और लड़कियां लगातार डर के साये में जी रही हैं और उन्हें उनके धर्म की आजादी और स्वायत्तता से वंचित किया जा रहा है।