पाकिस्तान की ट्रांसपोर्ट पॉलिसी में निजी वाहनों का बोलबाला और सार्वजनिक बस सेवाओं की बदहाली से आम जनता परेशान

पाकिस्तान की ट्रांसपोर्ट पॉलिसी में निजी वाहनों का बोलबाला है, जबकि सार्वजनिक बस सेवाएं बुनियादी सुविधाओं की कमी से जूझ रही हैं।

Gautam Sahu24 October 20262 min read0 viewsWorld
पाकिस्तान की ट्रांसपोर्ट पॉलिसी में निजी वाहनों का बोलबाला और सार्वजनिक बस सेवाओं की बदहाली से आम जनता परेशान

कराची (पाकिस्तान): पाकिस्तान में ट्रांसपोर्ट पॉलिसी के तहत निजी वाहनों को ज्यादा अहमियत दी जा रही है, जिससे सार्वजनिक बस सेवाएं हाशिए पर चली गई हैं। बुनियादी ढांचे की कमी और सफर के बढ़ते खर्च की वजह से शहरी इलाकों में आवाजाही मुश्किल होती जा रही है।

द एक्सप्रेस ट्रिब्यून के मुताबिक, बसकारो और पाकिस्तान एंड काउंटिंग मोबिलिटी इंडेक्स की रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि देश के ट्रांसपोर्ट ढांचे में सार्वजनिक परिवहन की हिस्सेदारी 0.5% से भी कम है। इसके उलट, निजी मोटरसाइकिल, कार और रिक्शा का कब्जा 98.7% है।

रिपोर्ट के अनुसार, मई से सितंबर के बीच आठ अलग-अलग ट्रांसपोर्ट माध्यमों से एक किलोमीटर यात्रा करने की औसत लागत 10.48 रुपये से घटकर 9.65 रुपये हो गई है। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि यह गिरावट सिस्टम की बुनियादी कमजोरियों को नहीं छिपा सकती, खासकर तब जब हर 1,000 लोगों में से केवल 22 लोग ही कार खरीदने की क्षमता रखते हैं।

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ऑटो विशेषज्ञ मशूद अली खान ने कहा कि पाकिस्तान को यूरोप, चीन और भारत के ट्रांसपोर्ट नेटवर्क से सीखना चाहिए, जहां रिहायशी और कमर्शियल इलाकों को बेहतर तरीके से जोड़ा गया है। उन्होंने बताया कि लोगों को निजी वाहनों से दूर करने के लिए सुविधाजनक रूट, आधुनिक बुनियादी ढांचे और साफ-सुथरी सेवाओं की जरूरत है।

खान ने केंद्र और प्रांतीय सरकारों से बस सेवाओं के विस्तार और इलेक्ट्रिक वाहनों की ओर बढ़ने के लिए एक साझा और लंबी अवधि की रणनीति बनाने की अपील की है। उन्होंने सुझाव दिया कि आयातित वाहनों पर निर्भर रहने के बजाय देश में ही इलेक्ट्रिक बस बनाने वाली फैक्ट्रियां लगाने के लिए प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए।

आर्थिक केंद्र कराची की स्थिति पर चिंता जताते हुए खान ने कहा कि यहां सड़कों की खराब हालत और ट्रांसपोर्ट सुविधाओं की कमी से रोजाना का सफर मुश्किल हो गया है। उन्होंने केंद्र और प्रांतों के बीच तालमेल की कमी को भी परियोजनाओं में देरी और लागत बढ़ने का बड़ा कारण बताया।

मशूद अली खान के मुताबिक, पाकिस्तान में फिलहाल करीब 2,000 बसों का बेड़ा है, जबकि सालाना मांग 18,000 से 20,000 वाहनों तक हो सकती है। उन्होंने कहा कि यह घरेलू स्तर पर बसों के निर्माण और रोजगार पैदा करने का एक बड़ा मौका है।

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