Saudi Arabia में मिसाइलों की भारी कमी, रियाद ने फ्रांस और ब्रिटेन से मांगी मदद.

सऊदी अरब इन दिनों अपनी सुरक्षा को लेकर एक बेहद गंभीर और कठिन दौर से गुजर रहा है। देश के पास इस समय मिसाइल इंटरसेप्टर यानी हवा में ही दुश्मनों की मिसाइलों को गिराने वाले हथियारों की भारी कमी हो गई है। हालात यह हैं कि सऊदी अरब के मुख्य रक्षा आपूर्तिकर्ता अमेरिका खुद ईरान के खिलाफ चल रहे संघर्ष में व्यस्त होने के कारण नए हथियार देने में असमर्थ है। इस बड़ी मुश्किल से निपटने के लिए अब सऊदी प्रशासन ने दूसरे देशों से संपर्क साधना शुरू कर दिया है ताकि देश के सैन्य ठिकानों और अहम तेल भंडारों की सुरक्षा पुख्ता की जा सके।
चार देशों से मांगी गई मदद
क्षेत्रीय अधिकारियों से मिली जानकारी के अनुसार, सऊदी अरब ने फ्रांस, ब्रिटेन, पाकिस्तान और अपने पड़ोसी देश मिस्र से मदद की गुहार लगाई है। सऊदी अरब का कुल क्षेत्रफल पश्चिमी यूरोप के बराबर है और इतने बड़े भूभाग पर फैले सरकारी दफ्तरों, सैन्य अड्डों और तेल सुविधाओं की रक्षा करना एक बहुत बड़ी चुनौती बन गया है। अधिकारियों ने इस पूरी स्थिति को बेहद संवेदनशील और रक्षात्मक रूप से कठिन बताया है। वहीं दूसरी ओर, ब्रिटेन ने सऊदी अरब के साथ अपने पुराने रक्षा संबंधों को तो स्वीकार किया है, लेकिन इस बात की कोई जानकारी नहीं दी है कि उन्हें इस तरह की कोई विशेष मदद या अनुरोध मिला है या नहीं। इसके अलावा तुर्की और पाकिस्तान के अधिकारियों ने भी स्पष्ट किया कि उन्हें पिछले महीने हुए रक्षा समझौते के तहत ऐसा कोई औपचारिक अनुरोध प्राप्त नहीं हुआ है।
वैश्विक स्तर पर हथियारों का संकट
सऊदी अरब के सामने सबसे बड़ी समस्या यह है कि दुनिया भर के रक्षा भंडार इस समय बेहद कम स्तर पर पहुंच चुके हैं। यूरोप के देशों में भी हथियारों का स्टॉक महीनों पहले ही काफी कम आंका गया था, जिससे वे किसी अन्य देश को हथियार देने की स्थिति में नहीं हैं। यूक्रेन और दुनिया के दूसरे देश भी इन्हीं इंटरसेप्टर मिसाइलों को पाने के लिए आपस में मुकाबला कर रहे हैं, जिसके कारण वैश्विक स्तर पर हथियारों का एक बड़ा संकट पैदा हो गया है। इस आपूर्ति संकट की वजह से रियाद के पास अपनी सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखने के लिए बहुत कम विकल्प ही बचे हैं।
मस्कट में अमेरिकी और हूती अधिकारियों की बैठक
हथियारों की इस कमी के बीच अमेरिका ने कूटनीतिक रास्तों पर काम करना शुरू कर दिया है। इसी कड़ी में अमेरिकी प्रतिनिधियों ने पिछले सप्ताह मस्कट में हूती नेतृत्व के साथ सीधी बातचीत की। यह बैठक इस बात का संकेत देती है कि अमेरिका इस क्षेत्र में मौजूदा जमीनी हकीकत को ध्यान में रखते हुए किसी शांति समझौते की ओर बढ़ रहा है। इस समय लाल सागर का बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य और उसके आसपास के द्वीप हूती नियंत्रण में हैं और उन्हें वहां से हटाने के लिए फिलहाल कोई सैन्य बल तैयार नहीं हो रहा है। यही वजह है कि ओमान और मिस्र जैसे देश इस कूटनीतिक बातचीत में मध्यस्थ की भूमिका निभा रहे हैं ताकि क्षेत्र में शांति का रास्ता निकाला जा सके और हथियारों की कमी के बीच कूटनीति के जरिए हालात को संभाला जा सके।